Thursday, 27 December 2012

तबियत आपकी

तबियत जो आपकी कुछ नासाज़ है 
ये भी क्या कोई अदा नयी जनाब है 

पूछते है खैरियत जो लोगों की अक्सर 
कहिये क्यों ऐसे आज खुदके मिज़ाज हैं 

दुआओं का हमारी असर आप भी देखेंगे 
चेहरे पे आपके फूल फिर से चेहेकेंगे 

आपके ही दम पे तो ये महफ़िल आबाद है
आपसे रूबरू होना, हर दिल का खवाब है

मगर अफ़सोस
तबियत आपकी आज कुछ नासाज़ है

भरना वो आहें गर्म, अजी आपका हुज़ूर
निगाहों से बह रही, गज़ब की शराब है

करना वो तकाज़ा, हर बार आपका
लिखी है ये ग़ज़ल, कह रहे आदाब है

मगर अफ़सोस
तबियत आपकी क्यूँ नासाज़ है
ये भी क्या कोई अदा नयी जनाब है

"वैभव मैत्रेय"  

तेरी नज़रें

तेरी नज़रों ने आज पूछे
हैं कई सवाल मुझसे
जो न कह सका मैं तुझसे,
कह दूँगा आज रब से

शरमाना तेरा मुझसे
ना अब कबूल होगा
बैठे हैं इंतज़ार में
गोया नजाने कबसे

एक शोला था कहीं भड़का
साँसों के दर्मिया मेरी
छुकर बुझादी तूने
प्यासे थे लैब ये कबसे

तेरी नज़रों ने आज पूछे
हैं कई सवाल मुझसे
जो न कह सका मैं तुझसे,
कह दूँगा आज रब से

गालों पे हाथ रख कर
सुनना वो तेरी बातें
ना सुनी फिर कोई कहानी
एक बार सुन के तुझसे

आगोश में तेरी रहबर
यूँही पड़ा रहूँगा
हो जाऊंगा फनांह मैं
गर बिछडना पड़ा जो तुझसे

तेरी नज़रों ने आज पूछे
हैं कई सवाल मुझसे
जो न कह सका मैं तुझसे,
कह दूँगा आज रब से

"वैभव मैत्रेय"

Friday, 14 December 2012

हँसा था एक बार मैं जब

हँसा था एक बार मैं जब,
थे आंसू आँख में तब भी
भरी थी नीद आँखों में
मैं जाग़ा नींद से जब भी

मज़ा धुप में अक्सर जो
बारिश का आता है
न कीमत थी उसकी कोई 
न है कोई कीमत उसकी अब भी

सुनाई दे जो ख़ामोशी में
वो एहसास तुमसे है
ना पहले ही जुदा थे हम
न अलग कर पाएंगे वो अब भी

हँसा था एक बार मैं जब,
थे आंसू आँख में तब भी

वो शर्माना तेरा हरबार
और नज़रें झुका लेना
मोहोब्बत बेपनाह तुमसे
हमें है आज भी, अब भी

बचा कर आँख लोगो से
वो करना, तेरा बातें
जोश भरता था साँसों में
तेज करता है धड़कन अब भी

हँसा था एक बार मैं जब,
थे आंसू आँख में तब भी

"वैभव मैत्रेय"






 

Friday, 30 November 2012

पुरानी खिड़की

आज देखा उस पुरानी खिड़की से झांकती तेरी दो आँखों को
आज फिर महसूस किया उन दर्द में डूबे तेरे जज्बातों को
आज ले आया  मैं अपने साथ फिर उन्हीं सर्द रातों को
आज फिर हुआ  मैं मदहोश पाके तेरी हसीन बाँहों को

क्यों नहीं है तू चाहती आना इन उजालों में
वो कौन शख्स है, खोई है तू जिसके ख्यालों में
क्या वजह है तेरी इस बेरूखी की बता
थाम ले हाथ मेरा, ना मुझे यूँ सता

कर यकीन तू मेरा, मैं तेरा ही तो साया हूँ
मान कहना, साथ अपने तुझे लेने आया हूँ

है मुझे भी थामना तेरे इन नाज़ुक हाथों को
आज फिर महसूस किया उन दर्द में डूबे तेरे जज्बातों को

आज ले आया मैं अपने साथ फिर उन्हीं सर्द रातों को

आज फिर हुआ मैं मदहोश पाके तेरी हसीन बाँहों को


"वैभव मैत्रेय"

Monday, 19 November 2012

HONOR KILLING

गर न होती औरत
तो कहाँ से वजूद तेरा ही होता
गर न होती औरत
तो कौन तुझे बाप या दादा कहता

गर न होती औरत
तो कहाँ से ये संसार होता
न होती औरत अगर तो कैसे
जीवन का ये विस्तार होता

किस चाह ने ऐ इंसान
तुझे अँधा है किया
बिन सोचे ये किस राह पर
है तू चल दिया

क्यों बनी है आज दुश्मन
एक औरत ही औरत की
क्या जुर्म है उस बच्ची का
न दी इज़ाज़त जिसे तूने पैदा होने की

बनाया एक था
खुदा ने आदम और हव्वा को
न होगा आज भी मंज़ूर ये फरक
मेरे अल्लाह को

क्यों न काँपे थे तेरे हाथ
करके क़त्ल बच्ची का
क्या था कसूर बताओ
उस बिन पैदा हुई बच्ची का

मुमकिन था कि एक और "इंदिरा" हुई होती फिर पैदा
मुमकिन था फिर "शिवाजी" को भी करती कोई "जीजा" पैदा

हरबार तेरी इस हिमाकत पर
होगा वो भगवान् भी रोता
गर न होती औरत
तो कहाँ से वजूद तेरा ही होता

"वैभव मैत्रेय"





 

Friday, 9 November 2012

मैं और मेरी आवारगी

 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी 
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी 
 
सिर्फ बार पहली ख़ास थी आई जब तुम मेरी ज़िन्दगी 
हर मोड़ पर सजदा किया, वो थी खुदा की बंदगी 
 
नज़रों ने तेरी मेरी रूह को छुआ और छोड़ दी मैंने सादगी 
आगाज़ फिर मोहोब्त का हुआ और चलने लगी मेरी ज़िन्दगी 
 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी 
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी 
 
फिर मोड़ एक अजीब सा लेकर हमें यू मुड गया 
तेरा हाथ छुटा, साथ छुटा और रह गयी सिर्फ बेचारगी 
 
हर तरफ सब वीरान था, एक गरम तवे पर बूँद सा 
सब मिल गया था ख़ाक में, ऐसी थी वो नाराज़गी 
 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
 
जागा अचानक नींद से और देखा नए चेहरों को पास 
काले आसमा पर जैसे कुछ सफ़ेद लकीरें उदास 
थम ली मैंने भी बढ़कर एक ऊँगली उधार की 
खुदना शुरू हो गयी वो कब्र बनेगी कल मज़ार भी 
 
मसरूफइयत का दौर था, खुद का न कुछ होश था 
बढ़ता रहा मेरा काफिला और दूरियां भी बढ़ गयी 
गफलत में तेरी फनाह हुए, जाने ही कितने चिराग 
मय की बोतल, सिगरट का धुआं, लगने लगा था सब अज़ीज़ 
चाहता दिल जो जीतना वो अरमानो की एक जंग थी 
 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
 
हर बार एक आगोश में ये सोच कर मैं खो गया 
शायद मैं पाजाऊ तुझे या नसीब हो जाये खुदा 
जिद ये मेरी लेकर के आई जिस जगह ऐ दोस्तों 
मुमकिन न था फिर लौटना, जब मौत ने आगाज़ दी 
 
दरियां था मेरे पास लेकिन प्यास से ही मैं मर गया 
मसरूफ तुम अपनों में थी ये सोच कर कि मैं किधर गया 
बस ख़ुशी थी मुझे तेरे एक आबाद होने की 
नाम भी बेनाम हुआ, ख़त्म हुई मेरी आवारगी 
 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
 
"वैभव मैत्रेय"
 

Thursday, 8 November 2012

इश्वर बड़ा दयालु है

इश्वर बड़ा दयालु है
इश्वर बड़ा कृपालु है
है हर वक्त उसकी नज़र तुझपर
बेशक उसके हज़र्रों श्रद्धालु हैं

उसकी ही कृपा से ये दुनिया आबाद है
उसकी ही दया से आज ये संवाद है
उसी से मिलने को दिल रहता बेताब है
उसकी लीला का कहाँ कोई जवाब है

है हर वक्त उसकी नज़र तुझपर
बेशक उसके हज़र्रों श्रद्धालु हैं

छोड़ मोह इस चोले(शरीर) का
ले नाम सिर्फ उस भोले का
क्या करेगा माया के इस झोले का
याद रख वही तो परम शफतालु है

है हर वक्त उसकी नज़र तुझपर
बेशक उसके हज़र्रों श्रद्धालु हैं

आदि से अंत तक
देवों से संत तक
सभी में वही व्याप्त है
मिटाता वही हर संताप है
वो बड़ा दयालु है
वो असीम कृपालु है
है हर वक्त उसकी नज़र तुझपर
बेशक उसके हज़र्रों श्रद्धालु हैं

"वैभव मैत्रेय"


 

Tuesday, 6 November 2012

कैसा ये मौसम आया है

कैसा ये मौसम आया है
न जाने क्या पैगाम लाया है
दिल और दिमाग पर आज मेरे
तेरा ही जादू  छाया है

कशमकश में रात गुज़री
कशमकश में हुई सूबह
ये हवा का ठंडा झोंका
तेरा ही पैगाम लाया है
दिल और दिमाग पर आज मेरे
तेरा ही जादू छाया है

गगन भी आज रंगीन है
परिंदे भी लग रहे हसीन हैं
फूलों पे बैठे भवरों ने
ये जो प्रेम गीत गया है
दिल और दिमाग पर आज मेरे
तेरा ही जादू छाया है

कैसा ये मौसम आया है
न जाने क्या पैगाम लाया है

हैं हैरान सभी भीड़ में आज मुझपर
ना देखा किसीने तुमसा कोई दिलबर
खुशनसीबी पे मेरी, परियों ने भी आज
मिलन का जशन मनाया है

दिल और दिमाग पर आज मेरे
तेरा ही जादू छाया है

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 5 November 2012

क्यों ये फासले हैं

क्यों ये फासले हैं
क्यों ये दूरियां हैं
क्यों आज खामोश है तू
क्यों ये मजबूरियां हैं

कहाँ मुमकिन है की ये
याद ना आये तेरी
कहाँ मुश्किल है बता
क्यों ये दूरियाँ हैं

जानता हूँ नहीं चाहती तुम भी
देखना आँख में आंसू मेरी
फिर किस बात की ये हमें
मिल रही सजा है

क्यों ये फासले हैं
क्यों ये दूरियां हैं
क्यों आज खामोश है तू
क्यों ये मजबूरियां हैं

है परेशान तुभी
देख कर हालत ये मेरी
मेरी बाँहों में नहीं तू
बढ़ रही क्यों दूरियां हैं

"वैभव मैत्रेय"
 

ये दर्द किसे दिखलाऊ मै

ये दर्द किसे दिखलाऊ मै
ये दर्द बड़ा अजीब है
है दिल दिन रात रोता मेरा
ये वजह बड़ी वाजिब है

है गुनाह ये किसी और का
भुगत रहा कोई ओर है
ये दर्द किसे दिखलाऊ मै
ये दर्द बड़ा अजीब है

क्या भूक है
क्या प्यास है
इस बात का किसे एहसास है
कब दिन ढला
कब रात हुई
कहाँ इस बात का कोई हिसाब है
ये दर्द किसे दिखलाऊ मै
ये दर्द बड़ा अजीब है
है दिल दिन रात रोता मेरा
ये वजह बड़ी वाजिब है

"वैभव मैत्रेय"

 

कर के क़त्ल मेरा

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका कुछ भी तुझसे

तेरा रोना भी था देखा मैंने
गुमनामी के अंधेरों में
दर्द महसूस था किया
चोट लगी थी दिल पे

लोग भी आये जो देने कांधा मुझे
टूटा बाँध था आँखों से तेरी
न संभाल पाया मै तुझे

ले गए वो आखिर
मुझको दूर तुझसे

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी 
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका 
कुछ भी तुझसे

पहुंचा जनाज़ा जब मेरा
सूना था शमशान पड़ा
नहीं औकात किसी की
है खुदा ही सबसे बड़ा

जला दिया जिस्म फिर मेरा
पैदा करने वाले ने खुदसे

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका
कुछ भी तुझसे

"वैभव मैत्रेय"




 

Tuesday, 16 October 2012

तेरे इंतज़ार ने

तेरे इंतज़ार ने मुझे,
आज बेचैन  कर डाला
तुम जैसे कोई प्रेम मूरत
और मेरा मन हो कोई शिवाला

दर्शन को तेरे देवी,
ये भक्त कबसे खडा है
इस आस में है पागल,
कि तू देदे प्रेम प्याला

हर आहट तेरे आने का
देती है भ्रम मुझको
होगा हसीन वो वक़्त कितना,
जो लायेगा सामने तुझको

तूने मेरे बेचैन दिलको,
फिर दीवाना कर डाला
तुम जैसे कोई प्रेम मूरत
और मेरा मन हो कोई शिवाला

सोचना बस इतना है
और इतनी सी बस चाह है
राह तुमने जो है चलनी,
वो ही मेरी राह है

चली आओ अब तो
ए हमराह मेरी
कर दो इन राहों में
फिर से उजाला

तेरे इंतज़ार ने मुझे,
आज बेचैन कर डाला
तुम जैसे कोई प्रेम मूरत
और मेरा मन हो कोई शिवाला

"वैभव मैत्रेय"

Tuesday, 9 October 2012

ये ज्वर भी कमाल है

तप रहा है बदन
ये ज्वर भी कमाल है
आँखें डबडबाई सी हैं
और ज़बान बेहाल है

साँसे भी कुछ तेज़ हैं
दर्द से बुरा हाल है
बिन पिए एक गफलत में हूँ
मगर एहम ये सवाल है

क्यूँ जलाता है खुदा
बदन को इस ताप से
क्यों दुनिया लग रही बेमानी मुझे
न जाने क्यों ये संताप है

शायद ये भी उसकी एक चाल है
युद्ध लड़ने से पहले,
जैसे बना रहा कोई ढाल है
है जलाना चाहता
वो कमियों को मेरी इस ताप से
जल रहा है इसलिए
ये जिस्म कल रात से

"वैभव मैत्रेय"


 

Saturday, 22 September 2012

तेरे बिन

पत्थर में भी फूलों नें जगह पायी है
तेरे बिन हर गुलशन में भी तन्हाई है

चिरागों ने भी जो रौशनी न दी मुझे
तू उन्हें अपने दामन में भर लायी है

तेरे लबों का करूँ मैं क्या बयां
आज भी मेरी साँसों में तेरी गरमाई है

हर रात उलझ जाता हूँ तेरी ज़ुल्फ़ों में
ये सोच कर की दिन में घटाएँ छाई हैं

"मेरी प्यारी बीवी के लिए"

"वैभव मैत्रेय"
 

Friday, 21 September 2012

जब तुम उदास होती हो

जब तुम उदास होती हो
तब सब उदास होता है
तन्हाई के आलम में
ये दिल भी तब रोता है

जब तुम महकती हो
ये दिल तब चहकता है
मदहोशी के आलम में
ये दिल भी बहकता है

जब तुम उदास होती हो
तब सब उदास होता है

जब तुम चली जाती हो
एक ख़ामोशी छा जाती है
धुंध के आलम में
ये दिल भी भटकता है

और

जब तुम आ जाती हो
इक बहार सी आ जाती है
संगीत के मौसम सा
ये मन नाचता है

जब तुम उदास होती हो
तब सब उदास होता है

बस यही दुआ है मेरी रब से
कि तुम महेकती हुई आओ
इस दिल को बहकाओ
इस मन को नचाओ

क्यूंकि

जब तुम उदास होती हो
तब सब उदास होता है

"वैभव मैत्रेय"
 

हर जन्म तेरे साथ जीना है

हर  कदम तेरे साथ चलना है
बस एक तेरे प्यार में जलना है
है गर ये रिश्ता  सात जन्मों का
तो हर जन्म तेरे साथ जीना है
और हर जन्म तेरे साथ मरना है

"वैभव मैत्रेय"

Thursday, 13 September 2012

ये तुम आज क्या जाने फरमा रहे हो

ये तुम आज क्या जाने फरमा रहे हो,
ना चाहते हुए भी करीब आ रहे हो

हर बार, पकड़कर, दामन ये मेरा,
मुझे अपनी दुनिया में ले जा रहे हो

 कहा मैंने दी है ख़ुशी कोई तुमको,
ये किस बात पे फिर इतरा रहे हो

ये तुम आज क्या जाने फरमा रहे हो,
ना चाहते हुए भी करीब आ रहे हो

अश्कों का मल्हम लगा ना सके हम,
ज़ख्मो को तुम अपने क्यों सुलगा रहे हो

नहीं कोई बोतल है आज मैकदे में
क्यों तुम ये ज़हर फिर पिए जा रहे हो

ग़मों का समंदर हमारे लिए था
क्यों दिल को तुम अपने डूबा रहे हो

 ये तुम आज क्या जाने फरमा रहे हो,
ना चाहते हुए भी करीब आ रहे हो

"वैभव मैत्रेय"

Friday, 7 September 2012

ये दर्द क्या है

ये दर्द  क्या है
ये कब पैदा हुआ, कोई बतलाये ज़रा 

गर था पहले भी,
तो क्यों न कभी ये महसूस हुआ

और गर ये अभी पैदा हुआ, 
तो क्यों कर हुआ

कहीं ऐसा तो नहीं,
ये दौड़ रहा था मेरी रगों में
मेरे ही लहू के साथ
और महसूस हुआ है अभी,
अलग होते जज्बातों के साथ

क्या था इसे भी इंतज़ार
मेरे दुखी होने का
तनहा रातों में
बेहिसाब रोने का

चाहे कितना भी बेदर्द है ये दर्द,
मगर अच्छा है
नहीं है मिलावट इसमें
ये इतना सच्चा है

ये दर्द है तभी तो वजूद ख़ुशी का है
बेबसी में ही तो मज़ा सुकून का है
बदौलत अश्कों के ही तो मोल तेरी हँसी का है

"वैभव मैत्रेय"

आलम

ये सुबह का आलम, ये मदहोश समां 
ये बारिश का मौसम, ये तेरी साँसे जवां

"वैभव मैत्रेय"
 

Wednesday, 5 September 2012

खवाइश

मोहोब्बत तुझे बेपनाह दिन रात करतें हैं 
न पूछ कैसे खुदको तुझसे हम जुदा करतें हैं 
दर्द का मेरे न हो जाये दीदार कहीं तुझे 
बस खुदा से यही दुआ हर बार करतें हैं 

"वैभव मैत्रेय"

 

बेखबर

न चला मालूम उनको, मेरे मरने का सबब
दर पर था इंतज़ार उनको, मौत लेने आई थी जब
लेटाया गया फिर दो गज ज़मीन के नीचे हमें
कर रहे हैं इंतज़ार तब से, की तुम मिलने आओगे कब

"वैभव मैत्रेय"

 

खामोश निगाहें

तेरी मसरूफियत पर मेरी निगाहें आज खामोश हैं
खोया तेरे खयालो में हूँ, न मुझको कोई होश है

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 6 August 2012

कई बार तेरी बातें मेरे लिखने का सबब होती है

कई बार तेरी बातें मेरे लिखने का सबब होती है
ये दिल बेकाबू होता है जब दुनिया चैन से सोती है

कभी रोकना तेरा, थाम कर हाथ को मेरे
नहीं यहाँ गुंजाईश अंधेरों की, तेरे पास वो ज्योति है

छुकर जिस्म को तेरे, मेरा फनाह हो जाना
बैठ कर पास में तेरे, तेरी साँसों में खो जाना
करके बंद आँखें अपनी, तेरी दुनियाँ देख पाना
हँसता हूँ अकेले में अकसर मै बैठकर यारों
मै जागता हूँ सारी रात ओर वो चैन से सोती है

हाथ रखकर गालों पर, रहूँ तुझे दिन-रात मै सुनता
बिन सोये न जाने रहा कितने ख्वाब मै बुनता
मै जब गुनगुनाता हूँ, वो प्रेम के गीत संजोती है

कई बार तेरी बातें मेरे लिखने का सबब होती है
ये दिल बेकाबू होता है जब दुनिया चैन से सोती है

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 30 July 2012

दो बूँद पानी के लिए

कभी दो बूँद पानी के लिए
क्यों तूने अपने हैं लब सिये

मै वाकिफ था तेरी प्यास से
तन्हा था कई रात से
फिर मेरी किस बात पे
दिल के यूँ ये टुकड़े किये

ये दर्द कितना हसीन था
ना जुर्म ये कोई संगीन था
फिर क्यों मेरे जिस्म ओ जान पर
निगाहों से वार तूने किये

कुछ अहम सवाल थे तेरे पास
जिसे सोचकर है तू उदास
ये जो वक़्त गुज़र रहा सनम
नहीं मज़ा था इसमें भी कम
दो जिस्म थे बेज़ार से
हों जैसे दो जलते दिये

कभी दो बूँद पानी के लिए
क्यों तूने अपने हैं लब सिये

"वैभव मैत्रेय"

Thursday, 19 July 2012

तेरी रहमत का एहसास

तेरी रहमत का एहसास अक्सर होता है मुझे
तेरे करम से ही ये सब हासिल है मुझे

करता है तू हमेशा और होता है नाम मेरा
हर प्रेरणा है तू ही, सिर्फ चेहरा है एक मेरा

बिन पंख उड़ रहा मै, आकाश में ए खुदाया
नहीं डर मुझे किसी का, है जबतक है तेरा साया

करवाने वाला तू है, औकात क्या है मेरी
चले गए सभी जब, नज़रें न तुमने फेरी

माटी का मै खिलौना, गुलफाम हो गया हूँ
गुमनाम था अभी तक, पहचान हो गया हूँ

पाया है जो भी मैंने, दिया है तुम्ही ने मुझको
बढ़ा भी जो एक कदम मै, आये नज़र तुम मुझको

सिखाया तुने चलना, अंधेरों में भी मुझको
रोशन किये चिराग भी जब डर लगा था मुझको

है शुक्रिया हमेशा, ए परवर-दिगारे आलम
रखना यूँही इनायत, मेरा तुही है इक शिवाला

"वैभव मैत्रेय"



Wednesday, 18 July 2012

For you my friend

You are a true warrior
Know how to fight for your survivor

You are a pure mind
Be the same, wise and kind

You have a beautiful soul
People loves you so you love them all

You have a poet inside you
Let it be alive, let it be always you

You are a traveler, travelled places
See the beauty; see how nature embraces

You are so dear
Close your eyes and can find me near

Tuesday, 17 July 2012

रंजिशों से भी रिश्ते कायम होते हैं

रंजिशों से भी रिश्ते कायम होते हैं
नाराजगी के भी कुछ ऐसे आयाम होतें हैं

कि जब शब्दों का वजूद दरमियान नहीं होता
खामोशियों से इश्क के फरमान होतें है

लगाकर इलज़ाम हम पे, उसपर  उल्फत का
वो सरेबाज़ार खुद नीलाम होते हैं

ये गफलत में करीब अपने, हमें बुला लेना
और नापाक हम हैं, उसपर ये इलज़ाम होतें हैं

मांगते हो जो दिल मेरा, ये बिकाऊ चीज नहीं जानिब
खुदा का पाक घर है ये, जहाँ भगवान् रहतें हैं

वैभव मैत्रेय




जंग

 न कोई रिश्ता है दरमियाँ हमारे
वो कौन होगा जो मेरी तकदीर सवारें
ये क्यों अचानक रुकी नज़रें तुमपर
ये कौन सी है जंग जो बिन लड़े, हारे

"वैभव मैत्रेय"

सवाल

इस चिलमन से झांकती आँखों में तेरी
देखे हैं कितने आज सवाल मैंने
कुछ का जवाब है मेरे पास,
ओर कुछ मुझे भी है ज़िन्दगी से लेने

"वैभव मैत्रेय"

Friday, 13 July 2012

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

हर बार तेरा आना तेरी यादों के साथ
हर बार धड़कना दिल का कुछ जज्बातों के साथ
करना फिर इंतज़ार मेरा एक मुलाकात के बाद
आना बंद आँखों में तेरा एक खुमारी के साथ

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

झांकना मेरा तेरी आँखों में इस तरह
पढ़ रहा हो किताब कोई इबादत की तरह
और फिर तेरा मुस्कराना कुछ शरारत के साथ
गुज़रते वक़्त का थमना कुछ संकोच के साथ

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

एक रात भी बिस्तर पर न कटेगी तेरे साथ
एक दीदार चाँद का भी होगा कभी न तेरे साथ
है तलाश जिस बूँद की न मिलेगी मेरे पास
होगी सदी वो कौनसी जहाँ कृष्ण करेंगे रास

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

कभी चेहरों में ढूंडना चेहरा तेरा ओर मुस्करादेना
कभी सुनना तेरे गीतों को ओर गुन्गुनालेना
कभी छूना तेरे अंगारों को ओर साँसों में बसालेना

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

अक्सर मै ये सोचता हूँ
बालों को अपने नोचता हूँ
क्या ख़त्म होगा ये इंतज़ार भी मेरी ज़िन्दगी के साथ
या रहेंगे यूँही इन्हें हम पालते दीवानगी के साथ

"वैभव मैत्रेय"

Wednesday, 27 June 2012

है नहीं कोई तीसरा

क्या फर्क है दो इंसानों में
एक शांत है, एक अशांत है

हैं दोनों दिखते एक जैसे ही
एक अमीर है, एक गरीब है

चीखते दोनों ही हैं
एक दर्द देकर, एक दर्द पाकर

है भूख भी दोनों ही को
इसे पैसे की, उसे रोटी की

है प्रेम एक सामान भी
देदें अपनों के लिए जान भी

निर्दई भी है एक से
एक बचने के लिए और एक मारने के लिए

लेकिन यह कौन है जो है तीसरा
जो गरीबी में भी शांत है
न जिसका कोई देश है, न जिसका कोई प्रान्त है
ना पैसे का जिसे घमंड कोई
सोता है खा कर रोटी दो ही
है दर्द अपने में समेटे हुए
जला रहा प्रेम के दिए
है मारना जिसने सिखा नहीं
है जीवन मृत्यु से परे कहीं

मगर मै कैसे उसे खोजता
रहता ता उम्र यही सोचता
कि क्या वो सिर्फ मेरे ख्यालों में है
इन अनसुलझे सवालों में है

मै इसी उधेड़ बुन में था
कि आवाज़ दी सुनाई मुझे
कि क्यों हो इतना परेशान तुम
है जरुरत न करने की कोई जतन
ये तीसरा हम सभी में है
आदि से अंत तक हर सदी में है
ये बीज है उसी ईश का
जिसने तुम्हे ये जीवन दिया
ना कहीं कोई दो ही थे और ना तीसरा कहीं पैदा हुआ
हैं लड़ रहे हैं खुदी से हम
हो गए एक से दो हम
और कितनी अजीब बात है
जिस तीसरे को हम खोज रहे
वो हम ही में विद्यमान है

"वैभव मैत्रेय "

Tuesday, 26 June 2012

Creativity has no limits: ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा

Creativity has no limits: ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा: मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से क्यों कतराते हैं फिर क्यों हम कुछ दूर साथ चलने से खोये रहते है हर बार एक सोच को लेकर है क्या...

रात भर पिघलती रही ज़िन्दगी शबनम की तरह

एक ख्याल तेरा मुझे तेरे पास ले आया
रात भर पिघलती रही ज़िन्दगी शबनम की तरह

एक तेरे दीदार को जानिब हम तरसते रहे
कोई अपना आज हमे, अपनों से जुदा कर आया
ये शाम आज और भी हो सकती थी हसीन 
कोई सपना दिखा कर अपनों का , मेरी हँसी भी ले आया

बातों के दौर चलते रहे रंगीन बोतलों के साथ, हर एक शक्स मशगूल था वहां मेरे सिवा
मुझे नशा तेरी आँखों का था, मै आँखों से पी आया

एक ख्याल तेरा मुझे तेरे पास ले आया

उठ रहे थे तूफ़ान दिल में, न बाहर कोई शोर था
आँखों में मेरी चमक थी और चेहरे पे तेरा नूर था

इसी खींच तान में, समेट कर अपने को मै
चल पड़ा घर की तरफ, मै एक गुमनाम सा
गुज़रे चंद पल ही थे, लेकिन लगा मुझे क्यों जैसे
मै इन चंद साँसों में अपनी ज़िन्दगी जिआया

होता अक्सर यहीं है और बात भी सही है
नहीं होती हो तुम जब करीब, रहता है साथ तेरा साया

एक ख्याल तेरा मुझे तेरे पास ले आया
रात भर पिघलती रही ज़िन्दगी शबनम की तरह

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 25 June 2012

ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा

मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से
क्यों कतराते हैं फिर क्यों हम कुछ दूर साथ चलने से

खोये रहते है हर बार एक सोच को लेकर
है क्या फायदा बोलो कि बाद में हाथ मलने से

ये पल है अहम कितना ये कोई सोच कर देखे
बीत जायेगा ये भी कल उम्र के साथ ढलने से

मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से

सोचा है कई बार मैंने कि लौट आये वो गुज़रा वक़्त
मै जानता हूँ नहीं मुमकिन ये कोई भी चाल चलने से

बनाना रेत के टीलों पे वो आशियाँ अपना
उडा ले जाएँगी आंधियां, बचोगे सिर्फ संभल के चलने से

मोहोब्बत एक से करना ओर करना नफरत बाकियों से
नहीं लिखा किसी मजहब में कहीं भी ऐसा
मुमकिन है नसीब होजये जन्नत भी आज तुमको
नहीं है फायदा कोई अपने इमान से हटने में

कर हर आज वो तू काम जो लगता है तुझे अच्छा
न ज़रूरत बड़ा होने की, है बनकर रह तू बच्चा

"वैभव मैत्रेय"

Friday, 15 June 2012

मजबूरी

मजबूरी भी इंसान को कितना मजबूर करती है
न चाहते हुए भी ना जाने कितनो से दूर करती है

न मालूम कब, कैसे, कौन, कहाँ मजबूर हो जाये
न जाने ये वक़्त जो हसीं था, कब ग़मगीन हो जाये

कई बार लगता है कि मजबूर करना भी वक़्त की ही एक चाल है
मेरे ज़हन में ये आज फिर एक अहम सवाल है
कि क्या वजह है इस ताने बाने को बुनने की
कैसे हो जातें हैं कई बार इतने मजबूर हम
क्यों लगने लगती है ये दुनिया छोटी और बड़े अपने गम

ये मजबूरी उस वक़्त कहाँ थी कि जब मै बहुत खुश था
कहाँ गए वो दोस्त जिन के लिए कभी मै सब कुछ था
क्या वो भी कर रहे थे इंतज़ार मेरे मजबूर होने का
अपनों से हो कर के जुदा, मेरा अपनों के लिए रोने का

क्या बताऊ मै आज मजबूर कितना हूँ
किसे बताऊ कि मै दुखी कितना हूँ
काश ये वक़्त फिर एक बार बदल जाए
मेरी रूठी हुई तकदीर फिर से संवर जाए
चाल ये शै वाली जीत में फिर बदल जाए

ये खेल हर बार वक़्त यूँही खेलता है
हर बार मारा वक़्त का ये सब झेलता है
बात अजीब है कि मै ये हर बार खुद भी जानता हूँ
इश्वर की सत्ता को भी पूरी तरह मानता हूँ
हर रात के बाद होगा उजाला ये भी जानता हूँ
लेकिन है सबसे वक़्त ही बड़ा ये भी मानता हूँ

मजबूरी भी इंसान को कितना मजबूर करती है
न चाहते हुए भी ना जाने कितनो से दूर करती है

"वैभव मैत्रेय"


Wednesday, 13 June 2012

तेरे चेहरे में

तेरे चेहरे में वो नूर नज़र आता है
हर बात पर ये दिल आज भी बहल जाता है
शक्ल बेशक हैं इंसानों की
वजूद में तेरे मुझे भगवान् नज़र आता है

याद है क्या तुमको वो बरसात की रात
सर्दी का सा मौसम और आपका साथ
डूबे निगाहों में एक दूसरे की, थामे हुए हाथ
जवां होती उमंगें और मचलते जज़्बात
आज भी वो मंज़र बहुत याद आता है
तेरे चेहरे में वो नूर नज़र आता है
हर बात पर ये दिल आज भी बहल जाता है

हवा के झोंके सा हर बार तेरा आना ओर गुम हो जाना
कानो में कुछ बुदबुदाना और फिर खामोश हो जाना
जगाना रातों को, अपनी यादों में और खुद सो जाना
करके इज़हार हर बार, हमसे इनकार करवाना
इस सलीका ए मोहोब्बत से में वाकिफ नहीं हूँ
इबादत करता हूँ मै तेरी, कोई काफिर नहीं हूँ
थोडा मसरूफ हूँ ज़रूर दुनियादारी में
लेकिन एक लम्हा भी तेरे ख्याल से गाफिल नहीं हूँ

"वैभव मैत्रेय"

Thursday, 7 June 2012

कोशिश

कहाँ मुश्किल है समझना, गर करे कोई कोशिश
इन कोशिशों के दम पर ही तो आज चाँद आबाद है

नहीं मुश्किल मोती को पानी में खोजना
गर की जाए कोशिश तो मुमकिन ये भी जनाब है
एक धोती पहन कर चला था एक महात्मा एक दिन
कोशिशों की बदोलत आज ये देश आज़ाद है

गर आये हो दुनिया में, करो कोशिश संभल कर चलने की
डूब जाओगे वरना किनारे पर, ये वो अज़ाब है

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 4 June 2012

दिल की क्यों न कभी सुनी थी मैंने

दिल की क्यों न कभी सुनी थी मैंने 
आज अचानक सोचा तो ये जाना मैंने 

हम जो चाहते थे हमेशा पाना 
हम चाहते थे जिस डगर पे जाना 
वो दिल से होकर ही है जाती
नहीं फिर क्या हमें ये एहमियत समझ में आती 

क्यों हर बार फैसला दिमाग ही है करता 
क्यों हर रोज़ ये दिल बेचारा, तिल तिल के है मरता
 
किस शै से है हर बार तू डरता
 

एक बार दिल के कही, करके तो देख 
एक बार गिर कर फिर संभल कर तो देख

एक बार तो बहने दे  किनारों के ज़िन्दगी को

एक बार तो दिखा तू भी दिया इस रौशनी को 


क़यामत खुद कायनात बन जाएगी
मौत फिर नयी ज़िन्दगी सजाएगी
दुनिया और रोमानी हो जाएगी
तेरी ज़िन्दगी, दुनिया में एक मिसाल बन जाएगी
न किसी का खौफ होगा, न कोई अफ़सोस होगा
न कल की कोई चिंता, न आज पर फिर तुझे कोफ़्त होगा

एक बार इ दोस्त इस दिल की भी
एक बार कर प्यार, एक बार नए ख्वाब बुनले


"वैभव मैत्रेय"




Thursday, 24 May 2012

क्यों

वक़्त है खंजरों को निकाला जाए 
फिर किसी घाव को कुरेदा जाए 
फिर एक खून का दरिया बहाया जाये 
किसी जलचुकी चिता को फिर से सुलगाया जाए 
एक अंगार से उस दिए को भी जलाया जाए 
रोशन करदे जो वो शमा की जिसपे परवाने को फिर मिटाया जाए 

क्यों मगर इतनी नफरत को दे हम पनपने आज 
क्यों बेनूर हो गए वो रंगीन सपने आज
क्या किस्सा, क्या कहानी, है ये कौन सा राज़
क्या हुआ उन दुआओं का, कहा गयी वो आवाज
कि हर किसी के लिए जो दिल मरता था
किसी को कुछ भी कहने से जो डरता था
प्यार, मोहोब्बत की जो हर वक़्त बाते करता था

कहाँ गया वो शख्स जिसका पता ये सारी दुनिया थी
कहाँ खोया वो अक्स जिसका चेहरा ये मासूम मुनिया थी
वो तो कहता था सबका एक है खुदा
वो जो कहता था न हम कभी होंगे जुदा
फिर अचानक वो खो गया किन विरानो में
कैसे पहुंचा बिन मरे उन शमशानों में
कैसे पकड़ा ये खंजर, प्यार के दिवानो ने

गर मिल जाये आज खुदा तो मै उससे पूछुगा
कैसे आते है ऐसे सैलाब उससे पूछुंगा
ये कौन सी नस्ल है जो बन रही है आज हैवान
कहाँ है इनका मज़हब, कहाँ है आज भगवान्

"वैभव मैत्रेय"

 

नया मेहमान

कोटि कोटि धन्यवाद् इश्वर को इस सौगात का
देर ही से मिले इस अतिप्रिये इन्साफ का
हम जानते हैं की तुमने किया न इंतज़ार कम
हर ख़ुशी थी बेमानी, वो गम न था कम

इश्वार से यही प्रार्थना है
सभी मित्रों की भी शुभकामना है
रहे वो स्वस्थ और सुखी हमेशा
करे नाम रोशन आपका वो ऐसा
कि ना फिर रहे कोई और आशा
मिटा दे वो हर एक निराशा
करने लगें आप उसपर अभिमान
जीवन में बने वो महान इंसान



Thursday, 17 May 2012

आवाजें

कुछ आवाजें कहीं दूर से आती थी जब 
गीत मै ही गाता, तुम गुनगुनाती थी तब 

न मिल पाना, फिर भी सोचना हम बिछड़े थे कब 
सोचना मेरा, बंद आँखों में कैद कर लू, न जाने दूंगा अब 
यही वो दौर था की ज़िन्दगी में तेरी कोई और था जब 

एक नशा रहता था मेरी भी इन आखों में 
न देखा तुमने बेशक, चाहा था हमने ने तुम्हे लाखों में 

वो जाना तेरा और न आना वापस फिर कभी 
छुटे संगी और साथी मेरे भी सभी 
हो गयी तुम मसरूफ अपनी दुनियां में 
खोया मै भी न जाने किन गलियों में 

न जाने कितना वक़्त यूँ ही बीत गया 
मै हारा सब कुछ औरं ये वक़्त मुझसे जीत गया 

फिर अचानक तकदीर मुझपे मेहरबान हुई 
फिर गूंजी मेरे विरानो में तेरी आवाज़ सुरमई 

फिर वही गीत देने लगे सुनाई मुझे 
दिल लगा तड़पने और नयन चाहते थे देखना तुझे 
शायद मेरे इंतज़ार का यही हश्र था होना 
मै करने लगा फिर इंतज़ार और  भूल गया सोना 

एक दिन मेरी आखों को न यकीं हुआ 
मै था हैरान, जब मुझे तुमने छुआ

"वैभव मैत्रेय "

Monday, 14 May 2012

एक तूफ़ान उठा सिने में

एक तूफ़ान उठा सिने में 
फिर आने लगा मज़ा जीने में 
एक खुबसूरत नशा है आज पीने में 

करने को सब पार हदें 
तैयार था मै ओर तुम भी सनम 
पा लेता शायद आज तुम्हे 
गर न रोकता मै जो अपने कदम 
ये जो एहसास है आज पाया मैंने 
ये वो बेशकीमती एहसास है 
कहाँ से लाऊ वो शब्द बता 
ये न बुझ सकी वो प्यास है 

देख कर अपना ही चेहरा
मै न जाने क्यों मुस्कराने लगा
मेरी साँसे न जाने कहाँ खो गयी
मै साँसों में तेरी समाने लगा

हर बार आना बारिश का तेरे पैगाम के साथ
हर बार मेरा भीगना, लेके हाथों में तेरा हाथ
हर सुबह तेरा ज़िक्र सुबह की रौशनी के साथ
हर रात चले जाना तेरा, चाँद की चांदनी के पास
हर बार सुलगना जिस्मों का, इस मदहोशी के बाद
हर बार फनाह होना, तेरी बंदगी के बाद

ऐ तूफ़ान यूँ ही तू उठता-बैठता रह
ऐ दिल मेरे हर शाम तू यूही बहकता रह
ऐ जिस्म मेरे यूहीं चांदनी में दहकता रह
ऐ खुदा मेरा हर रोम, तेरी खुसबू से महकता रह

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 7 May 2012

एक अजीब वाकया

एक अजीब वाकया मेरे साथ आज हुआ 
एक शख्स ने टोका मुझे 
तो मुझे ये एहसास हुआ 
कि कोई बैठा था मेरे पास अपने में मशगूल 
मेरा छुना बन गया जैसे कोई शूल 

ऐसा कभी नहीं हुआ था पहले कभी 
कितने रहते हैं एक बस में यात्री सभी 
मेरा ध्यान कभी नहीं भंग किसी ने किया
फिर अचानक इन भद्र महिला को ये क्या हुआ 

मै लगा सोचने की वो इतनी परेशान क्यों है 
लोगो की भीड़ में लोगों ही से अनजान क्यूँ है 
कुछ तो बात है जिसने उसे परेशान है किया 
क्या किसी हादसे ने ऐसा उसे बना दिया 
मै अपने को अपने में समेटने लगा 
सोचा लिखू या न लिखू ये जो अचानक था हुआ 

फिर शायद वो अपनी बेवजह कहने का सबब जान गयी 
मै कितना हूँ परेशान शायद पहचान गयी 
वो उठी ओर चुपचाप चली गयी 
अब न शिकवा ओर न ही कोई शिकायत थी नयी 
लिखना तो मै शुरू कर ही चूका था 
अब तो सिर्फ बयां ही करना बचा था 
फिर कहाँ मैंने कभी कुछ छोडा है अधुरा 
आखिर इस वाकया को भी यहीं करता हूँ पूरा 

कि कुछ लोग न जाने इतने परेशान क्यों है 
अपने होने का उन्हें इतना गुमान क्यों है 
क्यों नहीं वो करते है मोहोब्बत सबसे 
क्यों पाल रहे है ये बिन बात के नफरत कबसे 

तुम भी सोचोगे की क्या ज़रुरत थी ये सब बयां करने की 
उन मर चुके जिस्मों के साथ खुद भी मरने की 

मेरा मकसद आज सिर्फ इतना है 
ये जो माहोल आज संगीन इतना है 

क्यों ना रोके कोई आज ये आखों से लहू बहने से 
क्यों झिजक्ति है कोई बहू आज अपने को बेटी कहने से 
कहीं ऐसा तो नहीं ये ज़ख्म अपनों ने ही हो दिए 
घर के चिराग ने ही कहीं न बुझाये हो ये दिए 

एक अजीब वाकया मेरे साथ आज हुआ

"वैभव मैत्रेय"







Friday, 4 May 2012

आवाज

तेरी आवाज मुझे बनाती है क्यों दीवाना 
मान कहना, न मचलना, थम जा 
बन जाये न कहीं कोई अफसाना 

ये  जस्बा ए मोहोब्बत नजाने  क्यों  पैदा  हुआ
मै हूँ गुम तुझमे, तुझसे न कभी अल्हैदा हुआ 
माना मसरूफ न थे हम बंदगी में तेरी 
चाहा बेपनाह, चाहा हर बार तुम हो जाओ मेरी 
जलना चाहे है इस शमा पे ये परवाना 
 
 
माना हर बार ये दूरी है तेरी मायूसी का सबब 
मैंने भी सिर्फ दिया प्यार, तुमसे बदले में माँगा है कब 
न छिपा चेहरे को अपने, नकाब हटा दे अब 
कहीं ऐसा न हो, मै हो जाऊ रुक्सत दुनिया से तेरी 
कहीं ऐसा न हो की तुम को पड़े कल पछताना

तेरी आवाज मुझे बनाती है क्यों दीवाना

आज फिर तेरा ज़िक्र चला

आज फिर तेरा ज़िक्र चला, आज फिर तेरी याद उभर आई 
बैठा था भीड़ में फिर भी, हर ओर थी सिर्फ तन्हाई 

तेरा हँसता हुआ चेहरा न जाने कब आँखों के आगे आ गया 
याद आया वो ज़माना, जब तेरी अदाओं का जादू मुझपे छा गया 

चला फिर सिलसिला उन खतों का जो शुरू तुमने किया 
कहाँ जानता था कुछ कहना, मगर बयां जो मैंने किया 
देखते - देखते वक़्त भी करवट लेता गया 
चलते - चलते फासला भी कम होता गया 

आये तुम करीब इतना की मै फिर पूर्ण हुआ 
सिर्फ चाहा तेरा साथ, न मांगी कोई ओर मैंने दुआ 

कई किस्से, कई बाते ज़हन में बसी हैं इस तरह 
नशा शराब में मिला हो, बंद बोतल में जिस तरह 
तेरी खुश्बू मै अक्सर महसूस करता हूँ अपने में 
न हो रूबरू तो क्या, मिल लेता हूँ मै सपने में 

हर बार तेरा आना ओर फनाह हो जाना 
करता है बेचैन तेरा मिलाना ओर मिल के खो जाना 

क्या ये दौर हमेशा गुज़रेगा इसी तरह 
क्या इस दिल को कभी मिलेगा सुकून किसी तरह 
या हर बार फिर मिलेगी यही रुसवाई 
आज फिर तेरा ज़िक्र चला, आज फिर तेरी याद उभर आई
बैठा था भीड़ में फिर भी, हर ओर थी सिर्फ तन्हाई




Wednesday, 2 May 2012

ये प्रकृति सुन्दर, अनमोल है

ये प्रकृति सुन्दर, अनमोल है 
रहते है सब जीव जहाँ 
वो धरती एकदम गोल है

हर और मनोहर दृश्य है 
जहाँ रह रहा मनुष्य है 
यहाँ बाग़ में कोयल गाती है 
और नदिया संगीत सुनाती हैं 
फसलें नाच दिखाती हैं 
और रेत टीले बनाती हैं 
इस मनोहर दृश्य का 
बोलो क्या कोई मोल है 

ये प्रकृति सुन्दर, अनमोल है
रहते है सब जीव जहाँ
वो धरती एकदम गोल है

तीन ऋतुओ का देखो खेल 
ग्रीषम,  शीत और बसंत का मेल 
साल शुरू है ग्रीष्म से होता
बसंत है फिर प्रकृति को धोता
 शीत में हर कोई चैन से सोता 
यहाँ पक्षियों का जो शोर है 
हर रात के बाद भोर है 
इन सब का न कोई मोल है 
ये प्रकृति बहुत अनमोल है 
रहते है सब जीव जहाँ वो धरती एकदम गोल है


Sunday, 22 April 2012

राजकुमारी

नाम उसका मिस्टी है  
तेज़ उसकी दृष्टी है  


है सुन्दर बाल उसके
हैं गुलाबी गाल उसके

आई परियों के देश से
रहती है वो ऐश से  

सुनती है हर रोज़ कहानी
मीठी है उसकी बाणी

पढने में है सबसे तेज़
बोले है जैसे अंग्रेज़


पापा की है राजकुमारी
लगती है वो सबको प्यारी


"वैभव मैत्रेय"  

Friday, 20 April 2012

एक फ़कीर दे रहा था

एक फ़कीर दे  रहा था दुआ आबाद होने की
जाना की देता है वही, न उम्मीद जिसको खोने  की

है दौलत जिन के पास, वो करते कहाँ हैं किसी से बात
नादान नहीं हैं जानते, अहमियत बोने की

जो बोया है  आज वही तो मिलेगा कल काटने को
करनी पड़ेगी कीमत अदा, उन्हें चैन से सोने  की

दो रोटी जरुरत है हर इंसान को जीने के लिए
क्यों चाहता है फिर वो मारना मुर्गी को सोने की  

एक फ़कीर दे रहा था दुआ आबाद होने की

"वैभव मैत्रेय"

जब भी आदमी आदमी से पशेमां होगा

जब भी आदमी आदमी से पशेमां होगा
ज़ाहिर है वहां कोई हैवानियत का निशां होगा

जिस दौलत को आज तुम समझते अजीज़ हो
फ़रिश्ता ए मौत के आगे न इसका कोई निशां होगा

दुखी हो देख कर जिन अपनों और परायों को
छुटेंगे सभी पीछे, जब मौत का फरमान होगा

जब भी आदमी आदमी से पशेमां होगा
ज़ाहिर है वहां कोई हैवानियत का निशां होगा

कर बंदगी ताउम्र तू सिर्फ अपने खुदा की
यहाँ तो था, वहां भी वो ही सर परस्त होगा  

"वैभव मैत्रेय"

Thursday, 19 April 2012

एहम

एक दरख़्त यू झुका और फल गिर गया
तनी हुई थी जो साख, उसका नामो निशाँ किधर गया

"वैभव मैत्रेय"

Wednesday, 18 April 2012

क्यों रोये रात भर

गम ए वजूद ही न था, फिर क्यों रोये रात भर
करीब आये न कभी, बीती सारी ये उम्र
शौंक ही  शौंक में हम पीते रहे
थामा हाथ न कभी, न देखा एक ही नज़र  
गम  ए वजूद ही  न था

मुफलिसी में तुम रहते अक्सर करीब थे
मिली दौलत जो तुम्हे, क्यों फेरली अपनी नज़र

गम ए वजूद ही न था


"वैभव मैत्रेय"

Tuesday, 17 April 2012

क़दमों के निशां

कुछ क़दमों के निशां भी देखें हमने
चले वो एक बार ही और हुजूम पीछे चल पड़ा
देखा उन चरागदीनो को भी हमने
कि पनाह में जिनकी अँधेरा ही पिघल पड़ा

"वैभव मैत्रेय"

तेरी खुशबु

मलते हैं इत्र जो बदन पर गुलाब का
समझाएँ कैसे हम उन्हें नशा शराब का
बेमतलब सा लगे है मुझे हर इत्र ए बदन
बेशकीमती है मेरे वास्ते आंसू अज़ाब का

"वैभव मैत्रेय"

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

ये कैसी हैं निगाहें जो नोचें है हर बदन
ये किसकी है चीख, ये किसका है रुदन
हर दिल आज लहुलुहान सा क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

ये कैसी गफलत में आज जी रहे हैं सभी
ये कौन सा विष बेखौफ पी रहे है सभी
ये बाप, बेटी का बनने से परेशान क्यों है
ये घर का मसीहा, बहार हैवान क्यों है
कौन पहचानेगा अपनों को और परायों को
कौन बांचेगा मौत के इन फरमानों को
कौन बचाएगा अस्मत आज बच्ची की मेरी

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

एक रोज़ दीवाना एक देखा मैंने
दुनिया के कायदों से अनजान था वो
देख इंसानी दरिंदों को पशेमान था वो
लूटा था भीड़ ने एक रोज़ सब कुछ उसका
अब न दर था न दरबान, सिर्फ एक उजड़ा मकान था
पढ़े लिखों के बीच में,  वो अकेला नादान था
न परवाह उसे दुनिया की न रोज़ी की थी खबर
बैठा था कब्रिस्तान में, खोद रहा अपनी कब्र
ये हर मासूम का ऐसा अंजाम क्यों है
हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है

 "वैभव मैत्रेय"

Monday, 16 April 2012

जिंदगी एक सफ़र

आज डी टी सी की ऐ.सी बस में बैठ मै सोचने लगा की  ज़िन्दगी क्या है ! आज सोचा तो महसूस किया कि ये जिंदगी एक न ख़त्म होने वाला एक सफ़र है जो मेरे पैदा होते ही शुरू हो गया था !

पैदा होने के चंद मिनटों के बाद मुझे भी लिटा दिया गया बाकी एक दर्जन बच्चों के साथ,
मै चिल्लाया बुलाने अपनों को, बतलाने दुनिया को कि मै नहीं अनाथ !
फिर घर मुझे भी लाया गया और प्यार से ये समझाया गया
कौन हैं माँ बाप मेरे, ये बोलना सिखलाया गया
चंद साल भी गुज़रे न थे, मुझे माँ कि गोद में खेलते
बोलना ही सिखा था मै और लगे लोग मुझे ठेलते
पहुंचा मै भी स्कूल सिखने कुछ इंसानी असूल
छोड़ना था मासूमियत को अपनी और कहलवाना था कूल

साल पे साल यूँही बीत गए
ख़त्म हुई पढाई तो लगा जैसे कोई जंग जीत गए
लकिन ये क्या, ये तो सिर्फ अभ्यास था
ज़िन्दगी जीना सीखने का, मात्र एक प्रयास था
अब शुरू हुई एक नयी नौकरी पाने की तलाश
साबित करने की खुद को कि नहीं मै कोई जिंदा लाश
ताकत लड़ने कि मुझमे भी है
कुछ हासिल करना मुझको भी है
और इसी कोशिश में नजाने क्या क्या ले आया मै अपने साथ
एक बीवी और दो बच्चे, जुड़ गए कब मेरे साथ

चल रही है नौकरी, भर रही हम सब का पेट
जाने मै किस रहा चल रहा जो ना मिला आज तक एक्सिट गेट
लेकिन इन लोगों कि भीड़ में जब भी होती इश्वर से भेंट
सारे दुःख दर्द मिट जाते और दिल कहता god हो तुसी ग्रेट

आज सोचा तो महसूस किया कि ये जिंदगी एक न ख़त्म होने वाला एक सफ़र ही तो है



Wednesday, 11 April 2012

हो गयी शाम पूरी जवां

ये अचानक क्या हुआ
चलने लगी क्यों तेज़ हवा
रात होने से पहले
हो गयी शाम पूरी जवां

ज़मीं तप रही थी जो गर्म तवे के समान
महक उठी खुसबू मिट्टी की करके ये सुखद स्नान
कोयल ने भी पकड़ी डाली अम्बिया की
करने लगी वो मधुर गान

प्रेमी युगल भी मग्न हो गए
जाने कब एक दूजे में खो गए
न रह गया फिर कोई ध्यान
रात होने से पहले
हो गयी शाम पूरी जवां

पीने वालो ने भी ढूंडा मौका
फिर से प्याले टकराने का
कहीं चल रही चाय की चुस्की
और कही रम से गम भुलाने का
बदल गया तमाम नज़ारा,
मस्ती में अंगड़ाई लेती शाम
दिन था जो बीता बदहाली में,
हुए आखिर सब अधूरे काम
रात होने से पहले
हो गयी शाम पूरी जवां

कोई गा रहा सावन के गीत
कोई याद कर रहा अपना मीत
कोई हवा में अटखेलियाँ कर रहा
कोई बिन पंखों के ही उड़ रहा
कोई कर रहा इश्वर का ध्यान
कोई बाँट रहा प्रेम ज्ञान
रात होने से पहले
हो गयी शाम पूरी जवां

हर रोज़ काश ये मंज़र होता
न फिर कोई पंछी भी प्यासा सोता
हर ओर सिर्फ हरियाली होती
न बेरहम ये गर्मी होती
न होती ज़रुरत ए सी, कूलर की
न बिजली की परवाह ही होती
ज़िन्दगी होती आसान
गर हर रोज़ रात होने से पहले
होती युहीं शाम जवां



Tuesday, 10 April 2012

रंग ए लहू लाल क्यों है?

मै अक्सर सोचता हूँ कि रंग ए लहू लाल क्यों है
गर होता नीला या सफ़ेद तो क्या होता
ओर जो होता तो क्या ये इन रगों में न बहता होता
क्या वजह है कि लाल होकर भी है लाल से जुदा
क्या वजह है कि हर किसी का मज़हब है जुदा
फिर क्यों कहते हो कि सब का एक है खुदा

मै अक्सर सोचता हूँ कि रंग ए लहू लाल क्यों है

क्या फायदा किसी को इस के होने का
न काम आया जब जरूरत थी मेरे अपनों को
न कर पाया क्यों पूरा मैं उन सपनो को
क्यों न बचा सका मै मेरे उन अपनों को
क्या फरक है तुम में ओर उस जानवर में बता
वो करता है डर के वार ओर इस में उसकी क्या है खता
तुम देखो तरफ अपनी जो घोपते हो बिन बात के खंज्हर
लूट मची है हर ओर और देख रहे तुम मंज़र

मै अक्सर सोचता हूँ कि रंग ए लहू लाल क्यों है

क्यों ये गर्म खून आज हो गया पानी
कहाँ गए वो नौजवां, कहाँ गयी वो रवानी
कहाँ है वो देश पे मिटने वाले,
कहाँ खोई है वो आजादी की कहानी
आज बहता है क्यों आँखों से ये लहू
औलाद के छोड़ने की वजह, बताओ किससे कहूँ

मै अक्सर सोचता हूँ कि रंग ए लहू लाल क्यों है

Friday, 6 April 2012

सीने में दर्द

सीने में ये दर्द क्यों, कभी कम नहीं होता
जब सोती है सारी दुनिया, ये बेचैन दिल क्यों नहीं सोता

क्यों रहती है शिकायत मुझे, अक्सर इस दिल से ए हमदम
आँखें सूख गयी कब की लेकिन ये दिल आज भी है क्यों रोता

मेरी हर फ़रियाद तेरे कानो तक जाके लौट आती है
मै चिल्लाता हूँ अकेले में, जब तेरी आवाज़ आती है
माना नहीं है मुमकिन नज़दीक मेरा तेरे आना
कर लिया आज हमने क्यों नसीब से ये भी समझोता

मै जहाँ भी, जैसे भी रहूँ, तू रहती हर पल साथ में मेरे
इस तन्हाई में बोलो, ये अँधेरे क्यों मुझे घेरे
बचते रहे है आज तक कालक से कोयले की
दामन से दाग फिर भी क्यों ये दिल नहीं धोता

मोहब्बत है इबादत उस खुदा की सुनते आये हैं हम साकी
पिला दे आज नज़रों से, न रहूँ होश में बाकी
संभालना कौन चाहे है कमबख्त आज तुम बोलो
न आज गुंजाईश शब्दों की, सिर्फ नज़रों से तुम बोलो
मै आया हूँ आज करने ज़िन्दगी से आखरी समझोता

सीने में ये दर्द क्यों, कभी कम नहीं होता
जब सोती है सारी दुनिया, ये बेचैन दिल क्यों नहीं सोता

Tuesday, 3 April 2012

अस्मत

काली अँधेरी रात में,
लम्बी खाली सड़क पर
चल पड़ा न जाने क्यों
मै अकेला परेशान सा
चारो तरफ ख़ामोशी थी
और न कहीं कोई इंसान था

माहोल कितना उदास था
न कोई भी मेरे पास था
सोचता सोचता
न जाने कहाँ तक आगया
अँधेरे में न जाने आज
मै कैसे भरमा गया

रोक कर कार अपनी
देख रहा था तारों को मै
कुछ होंट सूखे महसूस हुए,
तरसने लगा पानी को मै

फिर अचानक एक चीख से
टुटा वो सन्नाटा जो,
फिर किसी दरिन्दे ने,
लूटा जैसे किसी अस्मत को हो

एक गाडी तेज़ रफ़्तार ने
फेंका उसे कूड़े की तरह
न तन पे जिसके कोई लिबास था
सिमटी पड़ी थी वो मगर
लाचारी के उसका किसे एहसास था

देखते ही देखते
न जाने लोग कहाँ से आगये
ढक कर सफ़ेद चादर से उसे,
पुलिस स्टेशन पहुंचा गए
पुछा पुलिस वाले ने जो
उस अबला से पहला सवाल
काँप गयी रूह तक मेरी
मच गया ज़हन में बवाल
क्या नाम था तेरे यार का
बता किस से हुआ
तुझे प्यार था

वो सहमी ओर खामोश थी
न दिन, दुनिया की उसे होश थी
कुछ बोली भी न थी वोह अभी
चिलाया वो पुलिसवाला तभी
साला रोज़ का ही ये तमाशा है
कभी शीला, कभी मुन्नी ओर कभी आशा है

क्यों निकलती हो तुम सब रात में
अस्मत लुटवाने के लिया
जानती हो हैं जब घूमते
ये कुत्ते नोच खाने के लिए

वो कहती क्या ओर कहती किसे
सब व्यर्थ, सब बकवास था
लूट चूका था सबकुछ उसका
न बचा कुछ भी उसके पास था

फिर अचानक एक आवाज़ ने
रोक दी उस् की आखरी सांस भी
उठाकर पुलिस वाले के पिस्तोल से
ले ली उसने अपनी जान ही

मै कर नहीं पाया यकीन,
जो जुर्म था इतना संगीन
वो फाइल में बंद हो गया
बिना किसी गवाह के
वो केस रद्द हो गया
लूटते देखा एक संसार को
लेकिन मै भी लाचार था
न देखा था उन दरिंदों को मैंने
जिन्होंने किया ये व्यभिचार था

घूम रहे है वो दरिन्दे आज भी खुल्लेआम
कर रहे है न जाने कितनी अस्मतें नीलाम

"वैभव मैत्रेय"

Thursday, 29 March 2012

शायद कल ही की तो बात थी

शायद कल ही की तो बात थी
जब आप हमारे साथ थी
न दिन अभी ढला था ओर न हुई अभी रात थी

दिन की उस तपिश के बाद, छोड़ कर सारे विषाद
बारिश की रिमझिम बूंदों के बीच, मेरा हाथ थामे सावन के बीच
न कहीं कोई शोर था, न कहीं कोई आवाज़ थी
न दिन अभी ढला था ओर न हुई अभी रात थी

एक हवा का झोका यूँ झुल्फों को तेरी छु गया
बैठा तेरी आगोश में ओर न जाने कब खो गया
वक़्त था जैसे थम गया, थमी थी मेरी सांस भी
न दिन अभी ढला था ओर न हुई अभी रात थी

क्यों अचानक बीत गया, वो लम्हा हमारे प्यार का
क्यों अकेला रह गया, वो जिस्म बेज़ार सा
देखते ही देखते मंज़र सारा बदल गया
आँखें खुली तो दिल ये पागल मचल गया
तुम न थे करीब मेरे, तेरी खुसबू लेकिन साथ थी
न दिन अभी ढला था ओर न हुई अभी रात थी


Monday, 26 March 2012

तेरी खुसबू

तेरी चाहत में जो कटी रातें वो मै लाता कैसे
मेरे ख्वाबों को तेरी आँखों में बसाता कैसे
मेरी सांसो से तेरी खुसबू मै मिटाता कैसे

तुने दुनियां की निगाहों से जो बचकर देखा
प्यार ही प्यार निगाहों में भरकर देखा
कभी दूर तो कभी पास आकर देखा


मेरी नज़रें तुझे ढूंढे हैं दीवानों की तरह
दर्द बहता है मेरी आँखों से क्यों पानी की तरह
न पूरी हुई जो कभी उस कहानी की तरह
तेरी चाहत में जो कटी रातें वो मै लता कैसे
मेरे ख्वाबों को तेरी आँखों में बसाता कैसे
मेरी सांसो से तेरी खुसबू मै मिटाता कैसे

तेरी यादें में साथ अपने ले आया हूँ
हर शिकायत को आज छोड़ आया हूँ




Wednesday, 21 March 2012

प्रेम चारो ओर है

आनंद ही आनंद हर और है
शांति की बोछारें हैं और प्रेम चारो ओर है

हर आत्म में मै लीन हूँ
न मै दीन हूँ न मै हीन हूँ
इश्वर मुझ ही में व्याप्त है
मुझे आज न कोई संताप है

प्रेम धरा बह रही, न जिसका कोई छोर है
शांति की बोछारें हैं और प्रेम चारो ओर है

कितना सोम्य ये प्रकाश है
रंगों में भी रेशमी एहसास है

मै नभ में परिंदों सा उड़ रहा
बिन भाषा के सभी से जुड़ रहा
मानो अमृत पान कर रहा
न इच्छा है आज कोई, न चिंता ही कोई और है
शांति की बोछारें हैं और प्रेम चारो ओर है

ये किस जगत में मै आज आ गया
पैदा हुआ था मै कभी, फिर गर्भ में कैसे समा गया
ये क्या वही लोग हैं, गर हैं तो क्यों न कोई विरोध है
कितनी गहन शांति है, मधुर संगीत चहु ओर है
शांति की बोछारें हैं और प्रेम चारो ओर है

न दिन का इंतज़ार है, न रात का अन्धकार है
न मर रहा है यहाँ कोई, न पैदा हुआ कोई ओर है
मन्त्रों का सुन्दर गान है, परमात्मा सभी में विद्यमान है
आनंद ही आनंद हर और है
शांति की बोछारें हैं और प्रेम चारो ओर है
वैभव मैत्रेय

Monday, 19 March 2012

एक लम्हा

एक लम्हा कर गया नम कल क्यों आँखें मेरी
ख़ामोशी छागयी क्यों हर ओर, जब याद आई तेरी

न चाहा था मैंने सोचना, उस वक़्त बारे में तेरे
न चाहा था मैंने देखना, जिस वक़्त चेहरे को तेरे
फिर क्यों अचानक ये मंज़र बदल सा गया
फिर क्यों ये दिल तुझे पाने को मचल सा गया
लोगों की उस भीड़ में, आज मैं क्यों तनहा था
ज़िन्दगी के इन सवालों पर आज फिर से हैरां था

तुम तो मसरूफ थे अपनों में अंजानो की तरह
क्यों न सुन पाए तुम आज वो सिसकियाँ मेरी
एक लम्हा कर गया नम कल क्यों आँखें मेरी

वैभव मैत्रेय



Wednesday, 14 March 2012

हाँ हमें मोहोबात है

आज कर दो मदहोश हमें, ना होश में तुम रहने दो
दिल में जो है सैलाब उठा, बिन बाँध के आज बहने दो

क्या ज़रुरत आज हमें अल्फाजों की
गीत की इस लैय को, दिल के साज़ पे बजने दो
एक बूँद गिरी तवे पर और भाप बन गयी
समेट कर इन बूंदों को, प्यार की माला पिरोने दो
आज कर दो मदहोश हमें, ना होश में तुम रहने दो

कांपते होट मेरे, शब्दों के आज मोहताज नहीं
एक मरमरी एहसास में, आज इनको भिगोने दो
तेरी आवाज़ ने बनाया जो बेजुबान हमें
अपनी साँसों में मेरे जज़्बात आज जुड़ने दो
आज कर दो मदहोश हमें, ना होश में तुम रहने दो

ना हो दीदार तेरा तो गम की कोई बात नहीं
मन की आँखों से ना देखा हो, ऐसी कोई रात नहीं
बेशक ना हो तुम रूबरू मेरे, ना हो ऐसे हालात सही
बेपनाह मोहोबात है तुमसे, आज फिर यही कहने दो
आज कर दो मदहोश हमें, ना होश में तुम रहने दो

वैभव मैत्रेय

Friday, 2 March 2012

आखें

यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए

तू आये पास चाहे ना ही सही
बंद आँखों से ही शायद तेरा दीदार हो जाये

एक पैमाना जैसे भर के छलकता हो कहीं
दो बूंद जाम हमें भी शायद आज मिल जाए

मै अपनी प्यास बयां  कैसे करूँ तुझसे बता
काश तेरी आखों से ही शायद आज पी पायें

एक खुमारी सी मेरी आँखों में नज़र आती है मुझे
नशे में इसके शायद तू  भी आज बहक जाए

कोई चेहरा नहीं आता नज़र तेरे आगे
आज क्यूँ ना ये वक़्त यहीं ठहर जाए

मेरे हाथों की लकीरों में तेरा नाम है यू लिखा
कोई पंडित ना जिसे कभी  भी पढ़ पाए

यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए

वैभव मैत्रेय

Wednesday, 29 February 2012

कल तो बम्ब गिरेगा

कल तो बम्ब गिरेगा, बम्ब का काम है गिरना
छोड़ो बेकार की बातों में, कहीं मर न जाए पड़ना

कल तो बम्ब गिरेगा, बम्ब का काम है गिरना

कुछ कहानी कुर्सी की एसी है, हर एक सल्तनत आम हुई
तू कौन है, तेरा नाम है क्या, कई शेर भी यहाँ गुमनाम हुए
फिर क्यों बढ़ने की चाहत में, तुने बेच दिया अपना चैना
कल तो बम्ब गिरेगा, बम्ब का काम है गिरना

हमको वो सराहा करते थे, हम खोये है अपने कामों में
हमने भी चाह दिल से जिन्हें, उन्हें थाम न पाए बाँहों में
ये सच है झूठी बात नहीं, तुम मानलो मेरा कहना
कल तो बम्ब गिरेगा, बम्ब का काम है गिरना

उठा पटक

उठा पटक - उठा पटक
कभी इसको पटक, कभी उसको पटक

गर दिल जो तेरा कभी जाये जो भटक
एक भांग की गोली...... ले तू भी सटक

अटपट, खटपट, होती हरवक्त
सोयें देर से हमेशा.............जागें झटपट

उठा पटक - उठा पटक
कभी इसको पटक, कभी उसको पटक

क्यों हो रहा हर ओर ये जो इतना शोर
हुए कागज़ के रिश्ते, थामें रेशमी डोर

हुई लम्बी कहानी ओर छोटे नाटक
घर ग़ुम हो गए, दिखें सिर्फ फाटक

उठा पटक - उठा पटक
कभी इसको पटक, कभी उसको पटक

वैभव मैत्रेय




Friday, 24 February 2012

रेगिस्तान में फूल

एक अरसे के बाद खिला जब रेगिस्तान में फूल
बरसा मेघ उमड़ घुमड़ के, गर्मी हम फिर गए भूल

रेत के गर्म टीले बन गए ओस की ठंडी चादर
ख़त्म हुई तलाश पानी की, गोरी ने भरली गागर

पेड़ खड़े थे ठूंट से जो, आज हरे फिर होगये
पेट भर फलों को खाया और चादर तान के सोगये

ये जो सुरमई सी शाम है, ये आज तेरे नाम है
हम ने ढूंडा दिन रात जिसे वो आपका ही नाम है

क्या करूँ मै बयां, वो दिन भी कितने अजीब थे
दुनिया मेरे पीछे थी और हम तेरे रकीब थे

हर वक़्त तरसा मै सनम एक बूँद पानी के लिए
न निकला एक शब्द मुह से, जैसे होट अपने थे सिये

पड़ा रहा मै रेत पर उस कटीले झाड सा
न जिसका था कोई माली, बियाबान में उजाड़ सा

एक अरसे के बाद खिला जब रेगिस्तान में फूल
बरसा मेघ उमड़ घुमड़ के, गर्मी हम फिर गए भूल

Tuesday, 14 February 2012

हैप्पी वेलेंटाइन डे

बंद आँखों से हम अक्सर तेरा दीदार करते हैं
ये सच है मेरे हमदम की हम तुम से प्यार करते हैं

हर बात कैसे शब्दों में कही जाए हर बार
ख़ामोशी से ही सही हम ये इज़हार करते हैं
बंद आँखों से हम अक्सर तेरा दीदार करते हैं
ये सच है मेरे हमदम की हम तुम से प्यार करते हैं

ना चाहा कभी तेरी चाहत भी मिल जाए बदले में
तुम भी चाहते हो हमें, ये हम एतबार करते हैं

जब नहीं होती तुम पास मेरे, मै कितना तनहा होता हूँ
जब नहीं करती तुम बात मुझसे, मै कितना उदास होता हूँ
रात काटी हैं आँखों ही आँखों में यूँ तो कई बार मैंने
तुम भी जागी हो कितनी रातें, हम एहतराम करते हैं

बंद आँखों से हम अक्सर तेरा दीदार करते हैं
ये सच है मेरे हमदम की हम तुम से प्यार करते हैं

दूर हो कर भी कभी, कहीं कोई दूरी नहीं दिखती
जब से ख़रीदा है मुझे तुने, मेरी शख्सियत नहीं दिखती
टुकड़े टुकड़ों में शायद मै आज बिक भी जाऊं मेरे मौला
ये सच है लेकिन किसी बाज़ार में ये मोहोबत  नहीं बिकती

तुम्हे चाहा हैं मैंने जिस दीवानगी से ए हमदम  
नहीं होगी कभी ये कम, आज ये एलान करते हैं

मेरी मोहोबत नहीं मोहताज़ किसी भी दिन या मौके की
खुश्बू रहेगी यूँही जिंदा, ना ज़रूरत किसी हवा के झोंके की

ये रिश्ता नहीं ऐसा की हम समझाएं दुनिया को
ये ना जाने दौर है कैसा, क्यों अपने ठुकराया करते हैं

बंद आँखों से हम अक्सर तेरा दीदार करते हैं
ये सच है मेरे हमदम की हम तुम से प्यार करते हैं

वैभव मैत्रेय 


Tuesday, 7 February 2012

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी

आज क्यों न जाने होगई नम आखें हमारी
एक दर्द उठा सिने में, जुबा भी लड़खड़ाई हमारी

तेरे जाने का एहसास, न किया था महसूस मैंने कभी
तुमसे न मिलना होगा, न ये सोचा था कभी

आज एक रिश्ते को रिश्ते से खरीदना क्यों पड़ा
आज मेरे दिल को तेरा दिल तोडना क्यों पड़ा

नहीं है आज मेरे पास कोई जवाब इन बातों का
नहीं कर सकता कोई आज अंदाजा मेरे जज्बातों का

मेरे शब्दों  मेरी आँखों में कोई ताल मेल नहीं है आज
न कोई गीत है कहीं न बज रहा है कोई साज

दर्द ही दर्द सराबोर है हर और इतना
बयां है हाले दिल की तुम से मोहबात है कितना

क्या बतलाओ बेड़ियों में जकड़े, मै अपने मासूम दिल का हाल
कुछ रिश्ते बहुत अहम है, उठे है जिन पे ये सवाल

उन्हें भी मै चाहता हूँ, पागलपन की हद तक
न करूँगा कभी जुदा, मै जिन्हें मरते दम तक

नहीं मै स्वार्थी इतना की छीनलूं ख़ुशी मै अपनों की
नहीं मै बेवफा इतना की करदूं वफ़ा नीलाम अपनी

मै चाहता हूँ तुम्हे जितना वोह मुझ तक ही है सिमित
मै चाहता हूँ तुम्हे कितना इससे तुम भी हो वाकिफ

इन जस्बातों की नहीं कोई कीमत, चाहे बेच दो ये दुनिया सारी
आज क्यों न जाने होगई नम आखें हमारी
एक दर्द उठा सिने में, जुबा भी लड़खड़ाई हमारी


Friday, 3 February 2012

अनदेखा सच

आज कल हर रोज़ मै अपने को अपने से जुदा करता हूँ
इस ठंडी के मौसम में रजाई से ना निकलूं यही दुआ करता हूँ

लेकिन कहाँ हर दुआ किसी की कबूल होती है
उठना तो पड़ता ही है, जब श्रीमती गरमा गर्म चाय देती हैं

ये दिनचर्या सदियों से यूँही चलती थी
जब उठाने पर बिटिया दस बार आँखें मलती थी

और शायद ये कार्यक्रम यूँही आगे भी चलता रहता
गर आज वोह दीन मेरी नज़रों के सामने ना आया होता

ना मालूम इस से पहले भी मैंने देखा हो उसे
ना मालूम इस से पहले भी कितनो ने देखा हो उसे
पर ये करुणा ना उपजी थी आज से पहले कभी
माँगा कितनो ने आकर मेरे पास, लेकिन दिया ना कभी

आज कल हर रोज़ मै अपने को अपने से जुदा करता हूँ

कैसे करूँ बयां, मै उस पीड़ा से भरे दृश्य को
मिल जाये तेरी कृपा उस  असहाए मनुष्य को
ठिठुर रहा एक कम्बल में वो चार छोटे बच्चों के साथ
सिमटे हुए अपने में और  थामे एक दूसरे का हाथ

ना हीटर की कोई गुंजाईश, ना रजाई का कहीं नाम
ना कोफी का गरम प्याला, ना ब्लोअर का कहीं काम 
किससे करे गिला, वो अपनी इस परिस्थिति का
कहाँ से लाये मदद जो करे उद्धार उस मनस्थिति का

मेरे भी पास सिर्फ करुणा ही थी, उस वक़्त ना कुछ और था
मेरी आँखों में कुछ आंसू थे और ना जाने मै क्यों मजबूर था

हर बार मेरे तृप्त मन की इस अत्रिप्ता से मै डरता हूँ
मनुष्य ना हो इतना कठोर, प्रार्थना यही मै करता हूँ

आज कल हर रोज़ मै अपने को अपने से जुदा करता हूँ

फिर सुना एक मित्र से एक और पहलु अनसुना
कर्मों का ये जो भोग है, इश्वर ने ही है बुना
जिन्हें देख कर मै परेशान हूँ, मनुष्य होने पर पशेमान हूँ
वो उनका ही चुना जीवन है, मै जिससे अब तक अनजान हूँ

सुनाई उसी मित्र ने, कहानी एक विचित्र सी
हर दीन सुदामा नहीं, कुछ होते हैं कंस चरित्र भी

देखा अभी हाल ही में, एक पुरुष विकलांग था
जीवन यापन के लिए, भिक्षा ही जिसका काम था
रहता अनाथों के संग, एक आश्रम में घर की तरह
ना कोई उम्मीद किसी से, अधर में शुन्य की तरह

पुछा जो उस मित्र ने, क्या हो सकता कोई इलाज नहीं
मै भरूँगा खर्च सारा, मुझे कोई एतराज़ नहीं

बतलाया उसे जब मित्र ने, उस चिकित्सक का पता
बोला वो दीन ना चाहिए कुछ, ना ये करुणा दिखा

मै नहीं हूँ चाहता, अपनी स्तिथि को बदलना
खुश हूँ इन पहिंयो पे मै, नहीं चाहता मै चलना

यकीन नहीं था कानो पे अपने, पर बतलाया जब उस दीन ने
क्या कमा पाते हो तुम, जो समझे हो की हम हीन हैं

हर रोज़ एक गाँधी मै कम से कम कमाता हूँ
और कोई कभी दिलदार मिले जब, हज़ार भी ले जाता हूँ
गर न होता में अपाहिज, कौन मुझे फिर पूछता
मै भी खो जाता इस भीड़ में, और रहता इश्वर को कोसता

मै तो करता हूँ धन्यवाद, हर रोज़ उस भगवान् का
बनाया मुझे तुम सब से अलग और दिया हर साधन मुझे
तुम न वक़्त मेरा यु बर्बाद करो, हो गया रोज़ी का टाइम
कुछ काम करो, अपना काम करो

वैभव मैत्रेय

Tuesday, 24 January 2012

ईश का अंश

डूबा मै, डूबा क्यों,
डूबने से ना आज डरा क्यों
जाना मै, ना जाने तू,
उस ईश का ही मै अंश हूँ

एक हवा का झोंका मुझको, लेगया बादलों के पार
यहाँ के सारे रिश्ते छोड़े, छोड़ चला संसार
कर रहा मै आज दर्शन, देवो के महादेव का
जाने मैंने राज़ सारे, इस आत्मा अभेद का

क्यों फंसा इस चक्र में, मै भी औरों की तरह
क्यों रचा ये चक्र्व्हू हर बार इश्वर इस तरह

डूबा मै, डूबा क्यों,
डूबने से ना आज डरा क्यों
जाना मै, ना जाने तू,
उस ईश का ही मै अंश हूँ

हर दुःख मुझमे लीन था अब
और सुख का ना आभास रहा जब
एक लौ मुझमे प्रकट हुई और मै प्रकाश में खो गया
लगा मानो, दिनों से जागा, मै गहरी नींद में सो गया

अब ना कोई संगी मेरा, साथी भी सब भूल गया
एक अदृश्य आवाज़ में ही मै ना जान क्यों खो गया

क्या विचित्र वो लोक था,
ना संताप ना कोई शोक था
हर और अदम्य शान्ति थी
ना कहीं भी कोई क्रांति थी
ना मनुष्यों का कहीं शोर था
हर आत्म अपने में लीन था

डूबा मै, डूबा क्यों,
डूबने से ना आज डरा क्यों
जाना मै, ना जाने तू,
उस ईश का ही मै अंश हूँ

फिर ये अचानक क्या हुआ, सारा दृश्य कैसे बदल गया
मै नहीं था कहीं भी लेकिन गिरा और जैसे संभल गया
हो गया आज धन्य मै, देख कर उस विराट को
लाउ कहाँ से शब्द मै, व्यक्त करूँ कैसे उस ललाट को
वो परिभाषाओं से कोसों दूर है
उसके समक्ष है अथाह शान्ति और एक गज़ब का नूर है

देखते ही देखते मुझ ही में वो कहीं खो गया
मेरा सोना, तेरी कृपा से आज धन्य हो गया

जाना मै, ना जाने तू,
उस ईश का ही मै अंश हूँ

वैभव मैत्रेय