तप रहा है बदन
ये ज्वर भी कमाल है
आँखें डबडबाई सी हैं
और ज़बान बेहाल है
साँसे भी कुछ तेज़ हैं
दर्द से बुरा हाल है
बिन पिए एक गफलत में हूँ
मगर एहम ये सवाल है
क्यूँ जलाता है खुदा
बदन को इस ताप से
क्यों दुनिया लग रही बेमानी मुझे
न जाने क्यों ये संताप है
शायद ये भी उसकी एक चाल है
युद्ध लड़ने से पहले,
जैसे बना रहा कोई ढाल है
है जलाना चाहता
वो कमियों को मेरी इस ताप से
जल रहा है इसलिए
ये जिस्म कल रात से
"वैभव मैत्रेय"
ये ज्वर भी कमाल है
आँखें डबडबाई सी हैं
और ज़बान बेहाल है
साँसे भी कुछ तेज़ हैं
दर्द से बुरा हाल है
बिन पिए एक गफलत में हूँ
मगर एहम ये सवाल है
क्यूँ जलाता है खुदा
बदन को इस ताप से
क्यों दुनिया लग रही बेमानी मुझे
न जाने क्यों ये संताप है
शायद ये भी उसकी एक चाल है
युद्ध लड़ने से पहले,
जैसे बना रहा कोई ढाल है
है जलाना चाहता
वो कमियों को मेरी इस ताप से
जल रहा है इसलिए
ये जिस्म कल रात से
"वैभव मैत्रेय"