Wednesday, 11 April 2012

हो गयी शाम पूरी जवां

ये अचानक क्या हुआ
चलने लगी क्यों तेज़ हवा
रात होने से पहले
हो गयी शाम पूरी जवां

ज़मीं तप रही थी जो गर्म तवे के समान
महक उठी खुसबू मिट्टी की करके ये सुखद स्नान
कोयल ने भी पकड़ी डाली अम्बिया की
करने लगी वो मधुर गान

प्रेमी युगल भी मग्न हो गए
जाने कब एक दूजे में खो गए
न रह गया फिर कोई ध्यान
रात होने से पहले
हो गयी शाम पूरी जवां

पीने वालो ने भी ढूंडा मौका
फिर से प्याले टकराने का
कहीं चल रही चाय की चुस्की
और कही रम से गम भुलाने का
बदल गया तमाम नज़ारा,
मस्ती में अंगड़ाई लेती शाम
दिन था जो बीता बदहाली में,
हुए आखिर सब अधूरे काम
रात होने से पहले
हो गयी शाम पूरी जवां

कोई गा रहा सावन के गीत
कोई याद कर रहा अपना मीत
कोई हवा में अटखेलियाँ कर रहा
कोई बिन पंखों के ही उड़ रहा
कोई कर रहा इश्वर का ध्यान
कोई बाँट रहा प्रेम ज्ञान
रात होने से पहले
हो गयी शाम पूरी जवां

हर रोज़ काश ये मंज़र होता
न फिर कोई पंछी भी प्यासा सोता
हर ओर सिर्फ हरियाली होती
न बेरहम ये गर्मी होती
न होती ज़रुरत ए सी, कूलर की
न बिजली की परवाह ही होती
ज़िन्दगी होती आसान
गर हर रोज़ रात होने से पहले
होती युहीं शाम जवां



No comments:

Post a Comment