Thursday, 10 October 2013

खामोशी

खामोशी मेरी तुम सुन ना पाओगे
जब तक हमे ना अपने पास बुलाओगे
लबों पे मेरे मुस्कराहट तो होगी
मगर दिल के दर्द को कहाँ देखपाओगे
तरसति रहेंगी ये रातें भी तब तक
हमें अनजुमन में ना जब तक बुलाओगे
चिरागों की रोशनी तो परवाने के लिये थी
भला किस रोशनी से ये चिराग जलाओगे
"वैभव मैत्रेय"

Monday, 7 October 2013

तेरे ख्याल

एक पल भी तेरे ख्याल से गाफिल नहीं था मैं
बेशक तेरा चर्चा सरेआम ना हुआ
मजमां मेरी मसरूफियत का कारण बन गया
सलामत रहे तू फिर यही थी बस दुआ
"वैभव मैत्रेय"

तेरी रहमत

कृपा ईश्वर की मुझपर दिन रात रहती है
बड़ा खुशनसीब हूँ मैं ऐसा दुनियाँ कहती है
तेरी रहमत को मैं हरबार मेहसूस करता हूँ
करके हरबार तेरे दर्शन, मेरी अश्रुधारा बहती है
होते ही परेशान, बुलाना तेरा करीब
नज़रें इनायत ऐसी तेरी हरबार होती है
कृपा ईश्वर की मुझपर दिन रात रहती है
बड़ा खुशनसीब हूँ मैं ऐसा दुनियाँ कहती है
"वैभव मैत्रेय"

Wednesday, 18 September 2013

तेरी यादें

क्यूँ आता है मुझे याद वो गुज़रा ज़माना
करके बंद आखें वो तेरा मुस्कराना
बना के बहाना तेरा वो मिलने भी आना
मेरी शामों को भी वो रंगीं बनाना
हवाला मोहोब्बत का देकर के हमको
अक्सर तेरा हमें आजमाना

क्यूँ आता है मुझे याद वो गुज़रा ज़माना

मैं उस वक़्त को वापस बता लाऊ कैसे
सपनों को फिर से सजाऊ मैं कैसे
तेरी गर्म साँसे भुलाऊ मैं कैसे
चाहत है दिल में, दिखाऊ वो कैसे
आसां नहीं यू हमें भूल पाना

क्यूँ आता है मुझे याद वो गुज़रा ज़माना

"वैभव मैत्रेय"

हंसी

तेरी एक हंसी पे मैं हस दिया
तेरी कातिल निगाहों में यूँ फस गया

तेरे रूप के सदके मैं क्या करूँ
तेरा मासूम चेहरा दिल में बस गया

तेरी बातों में एक शरारत सी है
तेरे लबों पे एक मुस्कराहट से है
तेरे दीदार को ए जानेमन
मेरा बेचैन दिल भी मचल गया

तेरी एक हंसी पे मैं हस दिया
तेरी कातिल निगाहों में यूँ फस गया

तेरी ख़ामोशी भी नहीं बेज़ुबां
तेरी बातों पे लुटा दूँ मैं दोनों जहाँ
चल आज तुझे लेकर चलूँ वहां
मेरा इश्क मुकम्मल हो जाये जहाँ

"वैभव मैत्रेय"

Friday, 13 September 2013

एक रिश्ता मुकम्मल रहता है

कभी नज़रें इनायत से
कभी शिकवे शिकायत से 
एक रिश्ता मुकम्मल रहता है
तेरी दिलकश बातों से

कभी मजबूर कर देना
कभी मजबूर हो जाना
मांगना एक दूसरे से फिर माफ़ी
हर एक हिमाकत पे

कभी तकरार की बातें
कभी वो प्यार की रातें
खुदको फनाह करके
देना प्यार की सौगातें

एक रिश्ता मुकम्मल रहता है
तेरी दिलकश बातों से

कभी आना करीब तेरा
कभी खुद से जुदा करना
कभी ना मिलने की बातें
कभी पास आने के तेरे वादे
एक रिश्ता मुकम्मल रहता है
तेरी दिलकश बातों से

"वैभव मैत्रेय"

Tuesday, 3 September 2013

वो मेरा शहर कुछ और था

वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है

वो अंदाज़े बयां कुछ और था
ये अंदाज़े बयां कुछ और है

हर सांस पे तेरी मेरा रुक जाना
ना मेरा कोई तब जोर था
ना तेरा कोई आज जोर है
वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है


खोजाना तेरा मेरी बातों में
चारो तरफ मशहूर था

हमें सिर्फ तुमसे मोहोब्बत थी
जिसका छाया नशा हर ओर है

हर बात पे आंसू बहाना तेरा
ना तब मुझे मंज़ूर था
ना आज मुझे मंज़ूर है
वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है
वो अंदाज़े बयां कुछ और था
ये अंदाज़े बयां कुछ और है

सब शिकवे शिकायत फनाह हुए
एक तेरे आने के बाद
वो बीत गयी जो रात थी
हुई रिश्तों के नई भोर है

वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है
वो अंदाज़े बयां कुछ और था
ये अंदाज़े बयां कुछ और है

है फासला सिर्फ जिस्मों के बीच
ये जो डोर रही है तुमको खींच
मेरे दिल की आवाज़ थी
ना जिसने किया कभी शोर है

वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है
वो अंदाज़े बयां कुछ और था
ये अंदाज़े बयां कुछ और है

"वैभव मैत्रेय"



Wednesday, 21 August 2013

कोई रिश्ता ज़रूर है

तेरे मेरे दरमियाँ कोई रिश्ता ज़रूर है
यूँ ही नहीं देखा जो तेरी आँखों  में नूर है

मसरूफ सिर्फ तुम नहीं जानिब हम भी हैं
दुनियादारी से थोडा मुखातिब यक़ीनन हम भी हैं 

दिन रात मेरी ज़िन्दगी में जो आया सुरूर हैं
यकीं है मुझे, तेरी आँखों का कसूर हैं

नजाने किस बात का गुमां है तुम्हे
तुमने भी प्याला इश्क ये पिया तो ज़रूर है

क्यूँ हाथ थाम के मुझे करीब बुला लिया
दिल देकर क्यों अपना मेरा दिल चुरा लिया
तराना भी जो दिल है गा रहा
आप ही का हुज़ूर है


तेरे मेरे दरमियाँ कोई रिश्ता ज़रूर है
यूँ ही नहीं देखा जो तेरी आँखों  में नूर है

करना सनम की बातें हो कर सनम से दूर
आना करीब आपका, होकर नशें में चूर
मोहब्बत पे हमें आपकी बेपनाह गुरूर है

तेरे मेरे दरमियाँ कोई रिश्ता ज़रूर है
यूँ ही नहीं देखा जो तेरी आँखों  में नूर है

"वैभव मैत्रेय"


 

Tuesday, 6 August 2013

एक कतरा अश्क का

एक कतरा अश्क का
मेरी आँख में यूँ चुभ गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

हाथों में फिसलती रेत सा
तेरा दामन भी फिसल गया
जिन लबों को तूने गीत दिए
क्यों तन्हा उन्हें यूँ कर दिया 

एक कतरा अश्क का

कभी रौशनी की बात से
कभी अंधेरों में मुलाकात से
तेरा पता क्यों मैं पूछता
किस राह पर निकल गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

हर बार अधूरी बात कर 
तेरा बात ही बदल देना
हर बार गीत गुनगुनाना तेरा 
और संगीत ही बदल देना
मुझे फिर निशब्द कर गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

एक कतरा अश्क का
मेरी आँख में यूँ चुभ गया

"वैभव मैत्रेय"

इत्तेफाक

बूंदों में बरसती  रही
कुछ ज़िन्दगी इस तरह

किस्तों में पी रहा हो
कोई शराब जिस तरह

"वैभव मैत्रेय"

 

Monday, 5 August 2013

आँख लग गयी

बातों ही बातों में आँख लग गयी
रात भर पिघलती रही ज़िन्दगी खामोश सी

सुबह वो हमसे दूर हो गए
बात जो जुबां पे थी, दिल में दब गयी

"वैभव मैत्रेय"



 

देव अंश

कुछ रूहानी ताकतों ने
मुझसे मुझको जब किया जुदा
थम गयी हर सांस मेरी
मिल गया मुझको खुदा

रेत के बवंडरों से
वो दूर मुझको ले गया
वो हरी भरी वादियों की
खुशबू भी मुझको दे गया
कितनी हसीन है दोस्तों
उसकी हर एक अदा

कुछ रूहानी ताकतों ने
मुझसे मुझको जब किया जुदा
थम गयी हर सांस मेरी
मिल गया मुझको खुदा

लग रहा था ये मुझे
पाजाऊंगा मैं आज विजय
इस जन्म मृत्यु के चक्र से
न रहेगा ये जिस्म लदा
कुछ रूहानी ताकतों ने
मुझसे मुझको जब किया जुदा
थम गयी हर सांस मेरी
मिल गया मुझको खुदा

ना कहीं कोई शोर है
कितनी मधुर सुगंध है
कितनी संगीतमय भोर है
प्रकाश ओत प्रोत है
ये जो सफ़ेद दिव्य ज्योत है
कर रही मुझे शुद्ध है
सिर्फ प्रेम का मुझमे वास है
कोई कहीं न क्रुद्ध है
इश्वरत्व चारो ओर है
मुझमें ही मैत्रेय बुद्ध हैं

मैं ही देव अंश हूँ
उसी का बढ़ता वंश हूँ
मानव कल्याण के लिए
किया था खुदसे जुदा

कुछ रूहानी ताकतों ने
मुझसे मुझको जब किया जुदा
थम गयी हर सांस मेरी
मिल गया मुझको खुदा

"वैभव मैत्रेय"
 

Thursday, 18 July 2013

खुशबू आती नहीं कागज़ के फूल से

खुशबू  आती नहीं कागज़ के फूल से
याद किया उन्होंने आज अचानक भूल से

याद करके वो पछताए फिर बहुत
उठाया था आखिर हमको उन्होंने धूल से

बड़ी मुश्किल अल्हैदा किया था जिसे याद से
क्यूँ मांग लिया उसीको आज फ़रियाद में
बीत जाती ज़िन्दगी खामोशियों के बीच
क्यों लायी वापस ज़िन्दगी उन्हें भूल से

खुशबू आती नहीं कागज़ के फूल से
याद किया उन्होंने आज अचानक भूल से 

याद अगर याद तक रहती तो ठीक था
फासला जो था दरमियान रहता तो ठीक था
मगर लिखा था जाने क्या मेरे नसीब में
फनाह किया मुझे, मेरे ही रकीब ने
न सीखा सबक हमने, कोई मजनूं के इश्क से
चलने लगी फिर ज़िन्दगी, प्यार की भीख से

"वैभव मैत्रेय"
 

Thursday, 4 July 2013

प्यासा था वो फ़क़ीर और प्यासा ही मर गया

प्यासा था वो फ़क़ीर
और प्यासा ही मर गया
बैठा जो दरिया के पास था
वो कैसे मर गया

करता रहा वो इंतज़ार
अल्लाह के आने का
जब किसी ने न दी ज़कात
तो  बदनसीब मर गया

दिए थे कई मौके, खुदा ने भी उसे
देने आया था पानी, एक बच्चा जब उसे
पहचान नहीं पाया उस फ़रिश्ते को वो कभी
गवांता रहा हरबार वो मौके भी सभी

"वैभव मैत्रेय"

न मैंने ही कोशिश की

कुछ यादों पे मेरी ज़िन्दगी टिकी रही
न उसे ही याद आया
न मैंने ही कोशिश की

हर आहट पे लगा वो आगये
न मंजिल उसे मिली
न मैंने ही कोशिश की

"वैभव मैत्रेय"
 

वो गिला भी करतें हैं गैरों की तरह

वो गिला भी करतें हैं गैरों की तरह
वो आतें हैं हरबार लहरों की तरह
मेरी ख़ामोशी की भी एक कहानी है
नहीं पाओगे हमें हजारों की तरह

"वैभव मैत्रेय"
 

Tuesday, 2 July 2013

ना तुम थे कभी मेरे करीब....ना तुम्हे ही मैंने बनाया नसीब...

पाल रहा था एक सपना
जाने कितने साल से
आज आखिर निकल गया
वो तीर जो था कमान पे

चलो ये भी खूब रही
आखिर आपने ही कही
वो सपना था
उसे भूल जा
जान ले है यथार्थ क्या

मैं हूँ वो अप्सरा
जो आ सकती है सिर्फ ख्वाब में
मैं वो निराला फूल हूँ
जो खिला है गैर के बाग़ में

तुम नहीं मेरी दुनियाँ से हो
फिर क्यों दुखी हो ये कहो

क्यों आज तक हो पकडे
तुम मेरी परछाई को
क्यों बनाये बैठे हो तुम
इस किले हवाई को

मैं खुश हूँ अपनों के बीच
रही हूँ जिस ज़मीन को सींच
वो ही मेरा देश है
तू भी जा अब अपनों के बीच
क्यों बनाया ये भेष है

बीत गया वो काल है
और आज ये एहम सवाल है
ना तुम थे कभी मेरे करीब
ना तुम्हे ही मैंने बनाया नसीब

हम सिर्फ एक सफ़र में थे
और हँसके थोड़ी बात की
मेरा मकाम जब आगया
तो मैं वक़्त की मोहताज थी

चलो ये भी खूब रही
आखिर आपने ही कही

"वैभव मैत्रेय"

Tuesday, 18 June 2013

एक आह

एक आह थी जो रूह से
दिल में उतर गयी
हमें फनाह करके
वो नज़रें किधर गयी

दिन रात खोजता रहा
मैं आप का पता
पाया तुम्हें सिर्फ ख्वाब में
जहाँ भी नज़र गयी

करना ये एहसान
उनके मिलने पे ए खुदा
चली जाए मेरी जान भी
जिस ओर वो गयी

"वैभव मैत्रेय"

ढूँढ़ते हैं

हर बार बात करने का
वो बहाना ढूँढ़ते हैं
सुनाने को हमें अक्सर
वो तराना ढूँढ़ते हैं

करते हैं बयां वो
निगाहों ही से हमेशा
जलाकर हमें शमा पर
वो परवाना ढूँढ़ते हैं

"वैभव मैत्रेय"

Friday, 14 June 2013

चंद लम्हे प्यार के

चंद लम्हे प्यार के
मांग खुदसे उधार में
कुछ वक़्त गुज़रा
जो तुम्हारे साथ
लेकर के हाथों में हाथ
मेरी ज़िन्दगी जैसे
थम गयी
तेरी तेज़ चलती गर्म सांसे
मेरी सांसो में फिर रम गयी

नहीं कोई था
जहाँ दरमियाँ
थी प्यार की
बस नर्मियाँ
करता रहा सदके
ये दिल तेरे दीदार के
चंद लम्हे प्यार के
मांग खुदसे उधार में

मौसम भी कुछ
मस्त था
फिज़ाओं में
बारिश का
गश्त था
हम तुम थे जब
बादलों के पार
कानों में कुछ शोर करती
थी वो क्या मदमस्त फुहार
बादलों  ने डाले गले में
सफ़ेद रेशमी वो हार थे

"वैभव मैत्रेय"




Monday, 20 May 2013

अनुभूति

न जाने ये प्रेम कैसे
और कब हो जाता है
मानो ये जन्मो जन्मो
का कोई नाता है
एक नशीला जाम है
जो अक्सर
होटों के पास आकर के
छलक जाता है

वक़्त और उम्र
हो जाते हैं बेमानी
तब शुरू होती है
कोई प्रेम कहानी

दिल का दायरा
अपने आप बढ जाता है
पतझड़ भी फिर
सावन नज़र आता है
दिमाग कहाँ कुछ भी
सोच पाता है
चारो ओर सिर्फ तब
प्रेम नज़र आता है

"वैभव मैत्रेय"

गुज़रती है ज़िन्दगी

गुज़रती है ज़िन्दगी
कुछ इस अंदाज़ से
बचानी हो जैसे जान
चूहे को बाज़ से

ज़िन्दगी के चमन में
कांटे भी हैं जनाब
कब तक मुह छिपाईएगा
यूँ नकाब से

नशा आँखों से पीकर आपकी
उतना ही होता
क्यों प्यास फिर बुझाई
आपने शराब से

संभालना वो की
न फिर खानी पड़े ठोकर
फिर क्यूँ गिराया
गैरों की नज़रों में आपने

लगा कर दाग दामन पर
ढूंडना आब(पानी) को दर दर
यह वो कागज़ का दामन है
जो मिटजायेगा मिटाने से

"वैभव मैत्रेय"

सोचा कुछ बदला जाये

फिर से अपने को समेट कर
पहुँच गए हम फिर से घर
लगता नहीं अब कोई डर
गए जो अब फिर उस डगर 
कहीं हम न जाए मर

इसी पशोपेश में
एक और नए भेष में
न ही किसी तैश में

सोचा कुछ बदला जाये
खुद को फिर आज़माया जाये
उन काले अंधेरो से बहार
फिर अपने को लाया जाये

शायद दिया है एक ओर मौका
मेरे खुदा ने चलने का चाल
कैसे खेलूँगा मैं इस बार बाज़ी
अब है ये एक एहम सवाल

ये ज़िन्दगी नहीं कोई जुआ
शायद है शतरंज की बिसात
उस परवरदिगार के सामने
क्या है बन्दे की औकात

है शुक्रिया मालिक तुझे
ये ज़िन्दगी जो बक्शी मुझे
न चलूँगा फिर मैं उस डगर
फिर चाहे क्यूँ न जाऊ मर

"वैभव मैत्रेय"




Tuesday, 14 May 2013

एक आंसू

एक आंसू गिर पड़ा 
चुप चाप कल आँख से
कैसे छिपाऊ बताओ इसे
हुज़ूर मैं आप से

क्या बताऊ की ये आया
कहाँ से मेरे खुदा
क्या जानु क्यों बहा
क्यों परेशां है दिल होकर जुदा 

कर रहा था क्या ये भी
इंतज़ार मेरे तनहा होने का
शायद अफ़सोस था इसे भी
मेरे खामोश होने का

बह निकला अचानक
फट पड़े जज़्बात थे
एक आंसू गिर पड़ा
चुप चाप कल आँख से
कैसे छिपाऊ बताओ इसे
हुज़ूर मैं आप से

"वैभव मैत्रेय"
 

Monday, 29 April 2013

मुलाकात तो होगी

सोचा इतने दिनों बाद
मुलाकात तो होगी
कुछ मेरी तुम्हारी न सही
मगर बात तो होगी

लेकिन अभी खुदा को शायद
ये मंज़ूर नहीं
चलो अगर ऐसा है
तो ऐसा ही सही

ये दिल तुमसे मिलने की
चाह में धड़कने लगा था फिर से
तुम आओगे करीब सोच के
गुनगुनाने लगा था फिर से

और उस पर तेरे न आने का
जो पैगाम आ गया
दिल में उदासी और आँखों में
अँधेरा सा छा गया

"वैभव मैत्रेय"

Thursday, 18 April 2013

फिर धमाको से है देहला, आज एक ओर शहर

फिर धमाको से है देहला
आज एक ओर शहर
फिर न जाने क्यों है बरपा
इन मासूमों पे कहर

ये नजाने कैसे लोग है
लगा कौनसा इन्हें रोग है
इंसानियत को बेच रहे
सिर्फ पैसे का इन्हें लोभ है

एक हिमाकत पे इनकी
लहू का दरिया बह चला
हाथ में लेकर फिर कटारी
चल पड़ा अब किस शहर

फिर धमाको से है देहला
आज एक ओर शहर
फिर न जाने क्यों है बरपा
इन मासूमों पे कहर

जो मर गए
वो मौन हैं
जो  बच गए
उनका कौन है
वो भी पड़े हैं सड़कों पर
एक बेजुबां लाश से
तैयार हो रही है लिस्ट
जनाब कल ही रात से

खून कौन सा है बह रहा
रगो में इनकी ऐ खुदा
क्यों ये इतने हैवान हैं
क्यों हैं हमसे जुदा
कौन से चश्में का पानी
पिलाती है इनकी नहर

फिर धमाको से है देहला
आज एक ओर शहर
फिर न जाने क्यों है बरपा
इन मासूमों पे कहर

गर एक माँ ही ने
इन्हें पैदा किया
क्यूँ ज़हर रगो में भर दिया
किन अंधेरों में हैं ये जी रहे
पहन कर काले लिबास
क्यों सुनाई ना दी इन्हें
किसी मासूम की आवाज़

फिर धमाको से है देहला
आज एक ओर शहर
फिर न जाने क्यों है बरपा
इन मासूमों पे कहर

"वैभव मैत्रेय"

Friday, 12 April 2013

अकेला

एक बस स्टॉप पर
कई आवाजों के बीच
मैं अकेला ही खड़ा था
तुम्हारे इंतज़ार में

तेज़ आती रौशनी से
फिर अचानक चौका मैं
ना अब भी आई थी तुम
सिर्फ यादें थी तुम्हारी

और फिर वही शोर
खींचे था जो अपनी ओर

मैं थोडा परेशान सा
आपस के चेहरों से
बिलकुल अनजान सा
भरी बस में यूँ चढ़ गया
जैसे कहीं कोई जुमला
बिन कहे ही मर गया

तभी बज उठा ये फ़ोन
तोड़ कर सारे मौन
कानो में कुछ कह गया
सुनकर के तेरी आवाज़ मैं
जाने किस रौह में बह गया

अब कहाँ अकेला था मैं
तेरे सपनों ही से बहला था मैं

रात भर करता रहा
सिर्फ एक तेरा दीदार
महसूस हुआ ये मुझे
तुम आई थी बनकर बहार
तुमने ही तो डाले थे मेरे
गले में बाँहों के हार

"वैभव मैत्रेय"

Thursday, 28 March 2013

होली आई रे

सबके मन को रंगने आज
तेरे मेरे आँगन में आज
होली आई रे

कोई सूखा रहा, कोई गीला हुआ
कोई होश में तो कोई बेहोश हुआ
गैरों को भी अपना बनाने
होली आई रे

कहीं बच्चों का शोर था
एक हुडदंग सा चारो ओर था
भांग और गुंझिया पर ज़ोर था

गोपियों को आज भिगोने
कान्हा के टोली आई रे
होली आई रे

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 18 March 2013

एक रेशमी एहसास था

एक रेशमी एहसास था
कल जो भी मेरे पास था
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
वो कितना मुझको खास था

एक लम्हा सुरमई
छोड़ कर मेरे करीब
दूर जो चला गया
कल रात से उदास था

कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
वो कितना मुझको खास था

"वैभव मैत्रेय"
 

कभी वक़्त गुज़रा ख्याल में

कभी वक़्त गुज़रा ख्याल में
अपनों को भी न खबर हुई

तुम दिल में ऐसे बसे रहे
पाया तुम्हें जहाँ भी नज़र गयी

हर बार तेरे आने से
मेरी ज़िन्दगी कुछ ओर सवंर गयी

कभी वक़्त गुज़रा ख्याल में

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 11 March 2013

बड़ा अच्छा लगता है

तुमसे मिलना
साथ चलना
बड़ा अच्छा लगता है

कुछ न कहना
सुनते रहना
बड़ा अच्छा लगता है

"वैभव मैत्रेय"

तो आँसू छलक गए

सदियों के बाद
जो आये वो याद
तो आँसू  छलक गए

धड़का ये दिल
सुनके  तेरी आवाज़
तो आँसू छलक गए

रहो तुम आबाद
हुए हम बर्बाद
तो आँसू छलक गए

करने तेरा दीदार
लगी दीवानों की कतार
किया हमें जब शुमार
तो आँसू छलक गए

भूले सारे अपने गम
हुई नज़रें करम
तो आँसू छलक गए

न जाना इतनी दूर
ऐ मेरे हुज़ूर
कि होजाये हम मजबूर
और फिर आँसू छलक पड़ें

कहो मेरी कसम
मिलें हर एक जन्म
काश कहें फिर हम
कि आंसू किधर गए

"वैभव मैत्रेय"

 

Thursday, 28 February 2013

हाँ हमको मोहोब्बत है तुमसे

नहीं सोये वो
नजाने कितनी रातों से
उलझे रहे
नजाने किन फ़िज़ूल बातों में

नहीं जानते थे वो
इस इंतज़ार का सबब
था ये सवाल एहेम
कि तुम मिलोगे कब

बदलना करवट तनहा
सर्द रातों में
नहीं सोये वो
नजाने कितनी रातों से

ऐसा नहीं की
मोहोब्बत हम नहीं करते
कसूर इतना कि
हम इज़हार नहीं करते

क्या बताएं कि
दिल के करीब आप कितना हैं
नहीं जानते फिर भी
क्यों अँधेरा इतना है

चलो मैं आज तुमको
एक दुनियाँ नयी दिखलाता हूँ
थाम लो हाथ ज़रा
तुम्हे तुमसे भी मिलवाता हूँ
आज ये भी जानलो सनम
ये जो गीत मैं गुनगुनाता हूँ
बेपनाह मोहोब्बत है तुमसे
खुदसे ज्यादा तुमको चाहता हूँ

आज नहीं दे सकता
जाने तुम्हे अपने हाथों से
चाहता हूँ बहलाना दिल
तेरा अपनी बातों से
न उलझोगे अब तुम
फ़िज़ूल बातों में

"वैभव मैत्रेय"



 

Friday, 15 February 2013

क्या वैलेंटाइन डे एक पाप है ?

कल रात अचानक सडकों पर
ख़ामोशी देखी चारों ओर

सन्नाटा था फैला हुआ
न हीं था कोई गाड़ियों का शोर

एक तरफ तो जश्न था डे वैलेंटाइन का
दौर चल रहा था अंग्रेजी - देसी वाइन का
बाजारों में भी गज़ब की भीड़ थी
गाडी चलने के लिए, कहीं भी न छीड थी

 और वहीँ दूसरी तरफ

रोटी को भी तरस रहे
जाने कितने परिवार थे
प्रेम व्यर्थ था उनके लिया
ना बाँहों के ही कोई हार थे

अपने ही आंसू जो थे पी रहे
दो बूँद पानी की जगह
कट जाये ये रात भी
कर रहे थे ये दुआ

सोचता हूँ ये देख कर
ये पैसा भी कमाल है
जहाँ एक के लिए सिर्फ मस्ती हैं
वहीँ किसी की ज़िन्दगी का सवाल है

लुटा रहा है एक, इसको दोनों हाथ से
बिलख रहा है दूसरा, भूखा कल रात से

कहते है आज़ाद देश है
फिर क्यों दशा है लोगों के ऐसी
किसने बनाया ये भेष है

बहुत दुःख की बात है
ये जो काली स्याह रात है
किसी की दिलरुबा है ये
और किसी के लिए अभिशाप है
ऐसे में ऐ दोस्तों

क्या वैलेंटाइन डे एक पाप है ?


"वैभव मैत्रेय"






 

मेरी साँसों में होती हो

मेरी साँसों में होती हो
मेरे ख्वाबों में आती हो
न दिखाया कभी
जिन जस्बातों को मैंने
जानेबहार तुम उन
एहसासों में होती हो

खो जाती हो जब
उजालों में कहीं तुम
अक्सर तब तुम
मेरी सर्द रातों में होती हो

पास आकर भी जब
तुम दूर होती हो
मुझसे जुदा होने का
दर्द भी सहती हो

ज़बां से कभी कुछ
न कहा तुमने
लेकिन हजारों किस्से
अपनी आँखों से कहती हो

"वैभव मैत्रेय"



 

Wednesday, 23 January 2013

ज़िन्दगी और मौत

ज़िन्दगी और मौत कितनी हैं जुदा
एक पल को लगे है अपनी और एक पल में जुदा

कितनी ही बार करीब से देखा है दोनों को मैंने
रहती हैं साथ साथ, जैसे हो कोई सगी बहने

अब कल ही की जैसे रात थी
कितनी अजीब बात थी
जूंझ रही थी मौत से जो
उसे ज़िन्दगी ने सौगात दी

और वहीँ दूसरी तरफ

जीवन को वो पैदा करके
चली गयी थी आज वो
अपनों को तन्हा करके

ये क्या विडम्बना है,
मुझको बता तू ऐ खुदा
ज़िन्दगी और मौत आखिर
क्यों हैं इतनी जुदा
एक पल जो लगे थी अपनी
कैसे वो हो गयी जुदा

रोज़ हजारों हैं झेलते
इन बहनों की तकरार को
खुशनसीब हैं जिन्होंने
पाया जीवन के उपहार को

और वहीँ दूसरी तरफ

मौत आई हिस्से में जिनके
सब कुछ ही जैसे थम गया
एक हँसता, मुस्कराता चेहरा
ना जाने अब किधर गया

एक तरफ तो जशन है
वहीँ सन्नाटा है दूसरी ओर
एक ने थामी है ज़िन्दगी
और एक ने छोड़ दी है डोर

अब हर तरफ ख़ामोशी है छाई
न सुनाई देता कोई शोर
आज अँधेरा है ज़रूर हर तरफ
लेकिन कल होगी विभोर

ये नियति है इंसान की
कहाँ चलता है किसी का ज़ोर

"वैभव मैत्रेय"
 

Monday, 21 January 2013

काले बादल

ये जो कुछ काले बादल आज नज़र आये हैं
और कुछ नहीं सिर्फ ग़मगीन हवाएँ हैं

आप दरख़्त हैं
फलों से लदा हुआ जो गिर नहीं सकता
आपके साथ
मुझ जैसे हज़ारों की दुआएं हैं

हम सब तो कायल हैं आपकी हौसला बुलंदी के
ऐसे कितने पड़ाव आप पीछे छोड़ आये हैं

यक़ीनन फिर उसी तेज़ से रोशन होगा ये चिराग
अरे आपने तो नजाने कितने सूरज उगाये हैं

"वैभव मैत्रेय"

Wednesday, 16 January 2013

करेंगे इंतज़ार हम

चले जाना तेरा वो आज,
आने का कल वादा करके
करेंगे इंतज़ार हम भी,
चाहे आना पड़े मर के

ख़ुशी इस बात की है दोस्त
कि चाहते तुम भी हो हमको
बेशक आज कही ये बात,
तुम ने यूँ डरते डरते

चले जाना तेरा वो आज,
आने का कल वादा करके
करेंगे इंतज़ार हम भी,
चाहे आना पड़े मर के

चाहता है दिल ये मेरा
भरलूं बाहों में आज तुम को
अरमां हो जाएँ आज पूरे
तुमको निगाहों में कैद करके

पिघल जाएगी ये शबनम भी
दिल में शोलें हैं जो भड़के
गुजारी रात जो आँखों में
नीद आई उन्हें तडके

चले जाना तेरा वो आज,
आने का कल वादा करके
करेंगे इंतज़ार हम भी,
चाहे आना पड़े मर के

तेरे दीदार को ए यार
मजमा है रोज़ यहाँ लगता
न खरीदा तुम ने कोई दिल
तेरे दीदार के सदके

बहा लहू जो आँखों से
एक दरिया ही बह निकला
हुआ फनाह ये आशिक भी
चला कंधो पे चार लध्के

"वैभव मैत्रेय"