Friday, 9 November 2012

मैं और मेरी आवारगी

 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी 
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी 
 
सिर्फ बार पहली ख़ास थी आई जब तुम मेरी ज़िन्दगी 
हर मोड़ पर सजदा किया, वो थी खुदा की बंदगी 
 
नज़रों ने तेरी मेरी रूह को छुआ और छोड़ दी मैंने सादगी 
आगाज़ फिर मोहोब्त का हुआ और चलने लगी मेरी ज़िन्दगी 
 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी 
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी 
 
फिर मोड़ एक अजीब सा लेकर हमें यू मुड गया 
तेरा हाथ छुटा, साथ छुटा और रह गयी सिर्फ बेचारगी 
 
हर तरफ सब वीरान था, एक गरम तवे पर बूँद सा 
सब मिल गया था ख़ाक में, ऐसी थी वो नाराज़गी 
 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
 
जागा अचानक नींद से और देखा नए चेहरों को पास 
काले आसमा पर जैसे कुछ सफ़ेद लकीरें उदास 
थम ली मैंने भी बढ़कर एक ऊँगली उधार की 
खुदना शुरू हो गयी वो कब्र बनेगी कल मज़ार भी 
 
मसरूफइयत का दौर था, खुद का न कुछ होश था 
बढ़ता रहा मेरा काफिला और दूरियां भी बढ़ गयी 
गफलत में तेरी फनाह हुए, जाने ही कितने चिराग 
मय की बोतल, सिगरट का धुआं, लगने लगा था सब अज़ीज़ 
चाहता दिल जो जीतना वो अरमानो की एक जंग थी 
 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
 
हर बार एक आगोश में ये सोच कर मैं खो गया 
शायद मैं पाजाऊ तुझे या नसीब हो जाये खुदा 
जिद ये मेरी लेकर के आई जिस जगह ऐ दोस्तों 
मुमकिन न था फिर लौटना, जब मौत ने आगाज़ दी 
 
दरियां था मेरे पास लेकिन प्यास से ही मैं मर गया 
मसरूफ तुम अपनों में थी ये सोच कर कि मैं किधर गया 
बस ख़ुशी थी मुझे तेरे एक आबाद होने की 
नाम भी बेनाम हुआ, ख़त्म हुई मेरी आवारगी 
 
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
 
"वैभव मैत्रेय"
 

Thursday, 8 November 2012

इश्वर बड़ा दयालु है

इश्वर बड़ा दयालु है
इश्वर बड़ा कृपालु है
है हर वक्त उसकी नज़र तुझपर
बेशक उसके हज़र्रों श्रद्धालु हैं

उसकी ही कृपा से ये दुनिया आबाद है
उसकी ही दया से आज ये संवाद है
उसी से मिलने को दिल रहता बेताब है
उसकी लीला का कहाँ कोई जवाब है

है हर वक्त उसकी नज़र तुझपर
बेशक उसके हज़र्रों श्रद्धालु हैं

छोड़ मोह इस चोले(शरीर) का
ले नाम सिर्फ उस भोले का
क्या करेगा माया के इस झोले का
याद रख वही तो परम शफतालु है

है हर वक्त उसकी नज़र तुझपर
बेशक उसके हज़र्रों श्रद्धालु हैं

आदि से अंत तक
देवों से संत तक
सभी में वही व्याप्त है
मिटाता वही हर संताप है
वो बड़ा दयालु है
वो असीम कृपालु है
है हर वक्त उसकी नज़र तुझपर
बेशक उसके हज़र्रों श्रद्धालु हैं

"वैभव मैत्रेय"


 

Tuesday, 6 November 2012

कैसा ये मौसम आया है

कैसा ये मौसम आया है
न जाने क्या पैगाम लाया है
दिल और दिमाग पर आज मेरे
तेरा ही जादू  छाया है

कशमकश में रात गुज़री
कशमकश में हुई सूबह
ये हवा का ठंडा झोंका
तेरा ही पैगाम लाया है
दिल और दिमाग पर आज मेरे
तेरा ही जादू छाया है

गगन भी आज रंगीन है
परिंदे भी लग रहे हसीन हैं
फूलों पे बैठे भवरों ने
ये जो प्रेम गीत गया है
दिल और दिमाग पर आज मेरे
तेरा ही जादू छाया है

कैसा ये मौसम आया है
न जाने क्या पैगाम लाया है

हैं हैरान सभी भीड़ में आज मुझपर
ना देखा किसीने तुमसा कोई दिलबर
खुशनसीबी पे मेरी, परियों ने भी आज
मिलन का जशन मनाया है

दिल और दिमाग पर आज मेरे
तेरा ही जादू छाया है

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 5 November 2012

क्यों ये फासले हैं

क्यों ये फासले हैं
क्यों ये दूरियां हैं
क्यों आज खामोश है तू
क्यों ये मजबूरियां हैं

कहाँ मुमकिन है की ये
याद ना आये तेरी
कहाँ मुश्किल है बता
क्यों ये दूरियाँ हैं

जानता हूँ नहीं चाहती तुम भी
देखना आँख में आंसू मेरी
फिर किस बात की ये हमें
मिल रही सजा है

क्यों ये फासले हैं
क्यों ये दूरियां हैं
क्यों आज खामोश है तू
क्यों ये मजबूरियां हैं

है परेशान तुभी
देख कर हालत ये मेरी
मेरी बाँहों में नहीं तू
बढ़ रही क्यों दूरियां हैं

"वैभव मैत्रेय"
 

ये दर्द किसे दिखलाऊ मै

ये दर्द किसे दिखलाऊ मै
ये दर्द बड़ा अजीब है
है दिल दिन रात रोता मेरा
ये वजह बड़ी वाजिब है

है गुनाह ये किसी और का
भुगत रहा कोई ओर है
ये दर्द किसे दिखलाऊ मै
ये दर्द बड़ा अजीब है

क्या भूक है
क्या प्यास है
इस बात का किसे एहसास है
कब दिन ढला
कब रात हुई
कहाँ इस बात का कोई हिसाब है
ये दर्द किसे दिखलाऊ मै
ये दर्द बड़ा अजीब है
है दिल दिन रात रोता मेरा
ये वजह बड़ी वाजिब है

"वैभव मैत्रेय"

 

कर के क़त्ल मेरा

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका कुछ भी तुझसे

तेरा रोना भी था देखा मैंने
गुमनामी के अंधेरों में
दर्द महसूस था किया
चोट लगी थी दिल पे

लोग भी आये जो देने कांधा मुझे
टूटा बाँध था आँखों से तेरी
न संभाल पाया मै तुझे

ले गए वो आखिर
मुझको दूर तुझसे

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी 
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका 
कुछ भी तुझसे

पहुंचा जनाज़ा जब मेरा
सूना था शमशान पड़ा
नहीं औकात किसी की
है खुदा ही सबसे बड़ा

जला दिया जिस्म फिर मेरा
पैदा करने वाले ने खुदसे

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका
कुछ भी तुझसे

"वैभव मैत्रेय"