Friday, 25 November 2011

Haseen Sapna

एक कन्या कुवारी थी
वो तो लाखो पे भारी थी

हर दिल को अजीज़ थी
हर घर की दुलारी थी

उसकी चाल मतवाली थी
मेरे मित्र की वो साली थी

एक कन्या कुवारी थी

मिलवाया मुझे जिसने
वोह उसकी मामी थी

बाते हुई उससे
पर देती वो गाली थी

एक कन्या कुवारी थी

चेहरा ख़ूबसूरत था
और कानो में बाली थी

पहनी हुई उसने
वो ज़री वाली साडी थी

आखों में था कजरा
और होटों पे लाली थी

एक कन्या कुवारी थी

हर लड़के ने देख उसे
अपनी सासें थामी थी

एक बिजली गिरी जैसे
जब एक कन्या उसे..............मम्मी पुकारी थी

अब वो ना कन्या कुवारी थी
फिर भी मेरी आँखों में खुमारी थी

हुआ कुछ जादू था
और छाई बेकरारी थी

हडबडाकर जागा मै
और रह गयी अधूरी वो कहानी थी


वैभव मैत्रेय


Wednesday, 23 November 2011

Haal is desh ka

पुछा जो किसीने आज, हमें बतलाओ राज़
हाल क्या है समझाओ, हमें इस देश का

दिया जो जवाब मैंने, सहने पड़ेगे ताने
होगा शर्मिंदा हर नागरिक मेरे देश का

बोला वो अनजान मित्र, क्या है लोगो का चरित्र
थोडा बतलाओ मुझे, नागरिक हूँ मै भी इसी देश का

देश ने है की तर्राकि, नौकरी भी हुई पक्की
पास जिसके है पैसा, डोर थामे है वही इस देश का

पैसे की भी देखो माया, बेच रहे है लोग काया
अश्लीलता परोस रहा मीडिया इस देश का

गाड़ियां की भीड़ देखि, पैदल वाले की अनदेखी
लेटा ओढ़े सफ़ेद चादर आम आदमी इस देश का

नेताजी के कुरते की, ज़ेबें विचित्र देखि
फ़ैल हो गया है हर लोक्कर रिज़र्व बैंक का

नेता, अभिनेता सब मांगे जनता से भीख
नोट और वोट बनाते भविष्य इस देश का

रिश्तों का भी मोल भाव, कहीं धुप कहीं छाँव
कर रहा है माँ का भी सौदा, बेटा इस देश का

इमारतों की परिभाषा, चाँद छूने की भी आशा
रौंद रहा झोंपड़ियों को, समाज इस देश का

घर बनगया है फ्लैट, चाहिए सभी को हैट
पहना रहा है टोपियाँ, हर सक्षम इस देश का

बातें जो हुई मोबाइल, ना देख सकोगे तुम स्माइल
फैसबुक बना है जबसे प्रियतम इस देश का

सुन के ये सारी बातें, सुनी हो गयी हैं रातें
करवटों में खोज रहा बैचैन मनुष्य इस देश का

मै था अनजान अच्छा, फिर बन जाऊ बच्चा
परीपक्व होगया है बच्चा भी इस देश का



















Monday, 21 November 2011

Aagosh

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै

एक तेरी सुरमई आवाज़ का दीवाना हूँ मै
फिर वही ग़ज़ल गाना चाहता हूँ आज खामोश मै

तुम हो उलझी जिस कशमकश में बात वो संजीदा नहीं
सिर्फ यही यकीन दिलाना चाहता हूँ आज अफ़सोस मै
 

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै

हम तुम हुए थे जब जुदा वो लम्हा मुझे भुला नहीं
तुम फिर मिलोगी इस तरह था मैंने सोचा कभी नहीं


ये वक़्त का ही कोई खेल है, मेरा तेरा जो ये मेल है
तेरे ही खवाब चाहता हूँ आज देखना बेहोश मै


हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै


हर बार देखा मैंने तुझे अपने में ही डूबता
कहाँ खोजने जाता तुझे मै आज इस शोर में

जिस्म बेशक जुदा थे उस सफ़ेद चादर में सनम
आत्मा पर एक थी और भूले थे हम दुनिया के गम
होले से फिर तुमने कहा आज उसी जोश में

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै


वैभव मैत्रेय