ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
सिर्फ बार पहली ख़ास थी आई जब तुम मेरी ज़िन्दगी
हर मोड़ पर सजदा किया, वो थी खुदा की बंदगी
नज़रों ने तेरी मेरी रूह को छुआ और छोड़ दी मैंने सादगी
आगाज़ फिर मोहोब्त का हुआ और चलने लगी मेरी ज़िन्दगी
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
फिर मोड़ एक अजीब सा लेकर हमें यू मुड गया
तेरा हाथ छुटा, साथ छुटा और रह गयी सिर्फ बेचारगी
हर तरफ सब वीरान था, एक गरम तवे पर बूँद सा
सब मिल गया था ख़ाक में, ऐसी थी वो नाराज़गी
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
जागा अचानक नींद से और देखा नए चेहरों को पास
काले आसमा पर जैसे कुछ सफ़ेद लकीरें उदास
थम ली मैंने भी बढ़कर एक ऊँगली उधार की
खुदना शुरू हो गयी वो कब्र बनेगी कल मज़ार भी
मसरूफइयत का दौर था, खुद का न कुछ होश था
बढ़ता रहा मेरा काफिला और दूरियां भी बढ़ गयी
गफलत में तेरी फनाह हुए, जाने ही कितने चिराग
मय की बोतल, सिगरट का धुआं, लगने लगा था सब अज़ीज़
चाहता दिल जो जीतना वो अरमानो की एक जंग थी
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
हर बार एक आगोश में ये सोच कर मैं खो गया
शायद मैं पाजाऊ तुझे या नसीब हो जाये खुदा
जिद ये मेरी लेकर के आई जिस जगह ऐ दोस्तों
मुमकिन न था फिर लौटना, जब मौत ने आगाज़ दी
दरियां था मेरे पास लेकिन प्यास से ही मैं मर गया
मसरूफ तुम अपनों में थी ये सोच कर कि मैं किधर गया
बस ख़ुशी थी मुझे तेरे एक आबाद होने की
नाम भी बेनाम हुआ, ख़त्म हुई मेरी आवारगी
ये एहसास कुछ ख़ास था या थी मेरी दीवानगी
हर वक़्त तुझे ढूंडा किये मैं और मेरी आवारगी
"वैभव मैत्रेय"
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