Friday, 20 April 2012

एक फ़कीर दे रहा था

एक फ़कीर दे  रहा था दुआ आबाद होने की
जाना की देता है वही, न उम्मीद जिसको खोने  की

है दौलत जिन के पास, वो करते कहाँ हैं किसी से बात
नादान नहीं हैं जानते, अहमियत बोने की

जो बोया है  आज वही तो मिलेगा कल काटने को
करनी पड़ेगी कीमत अदा, उन्हें चैन से सोने  की

दो रोटी जरुरत है हर इंसान को जीने के लिए
क्यों चाहता है फिर वो मारना मुर्गी को सोने की  

एक फ़कीर दे रहा था दुआ आबाद होने की

"वैभव मैत्रेय"

जब भी आदमी आदमी से पशेमां होगा

जब भी आदमी आदमी से पशेमां होगा
ज़ाहिर है वहां कोई हैवानियत का निशां होगा

जिस दौलत को आज तुम समझते अजीज़ हो
फ़रिश्ता ए मौत के आगे न इसका कोई निशां होगा

दुखी हो देख कर जिन अपनों और परायों को
छुटेंगे सभी पीछे, जब मौत का फरमान होगा

जब भी आदमी आदमी से पशेमां होगा
ज़ाहिर है वहां कोई हैवानियत का निशां होगा

कर बंदगी ताउम्र तू सिर्फ अपने खुदा की
यहाँ तो था, वहां भी वो ही सर परस्त होगा  

"वैभव मैत्रेय"

Thursday, 19 April 2012

एहम

एक दरख़्त यू झुका और फल गिर गया
तनी हुई थी जो साख, उसका नामो निशाँ किधर गया

"वैभव मैत्रेय"

Wednesday, 18 April 2012

क्यों रोये रात भर

गम ए वजूद ही न था, फिर क्यों रोये रात भर
करीब आये न कभी, बीती सारी ये उम्र
शौंक ही  शौंक में हम पीते रहे
थामा हाथ न कभी, न देखा एक ही नज़र  
गम  ए वजूद ही  न था

मुफलिसी में तुम रहते अक्सर करीब थे
मिली दौलत जो तुम्हे, क्यों फेरली अपनी नज़र

गम ए वजूद ही न था


"वैभव मैत्रेय"

Tuesday, 17 April 2012

क़दमों के निशां

कुछ क़दमों के निशां भी देखें हमने
चले वो एक बार ही और हुजूम पीछे चल पड़ा
देखा उन चरागदीनो को भी हमने
कि पनाह में जिनकी अँधेरा ही पिघल पड़ा

"वैभव मैत्रेय"

तेरी खुशबु

मलते हैं इत्र जो बदन पर गुलाब का
समझाएँ कैसे हम उन्हें नशा शराब का
बेमतलब सा लगे है मुझे हर इत्र ए बदन
बेशकीमती है मेरे वास्ते आंसू अज़ाब का

"वैभव मैत्रेय"

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

ये कैसी हैं निगाहें जो नोचें है हर बदन
ये किसकी है चीख, ये किसका है रुदन
हर दिल आज लहुलुहान सा क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

ये कैसी गफलत में आज जी रहे हैं सभी
ये कौन सा विष बेखौफ पी रहे है सभी
ये बाप, बेटी का बनने से परेशान क्यों है
ये घर का मसीहा, बहार हैवान क्यों है
कौन पहचानेगा अपनों को और परायों को
कौन बांचेगा मौत के इन फरमानों को
कौन बचाएगा अस्मत आज बच्ची की मेरी

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

एक रोज़ दीवाना एक देखा मैंने
दुनिया के कायदों से अनजान था वो
देख इंसानी दरिंदों को पशेमान था वो
लूटा था भीड़ ने एक रोज़ सब कुछ उसका
अब न दर था न दरबान, सिर्फ एक उजड़ा मकान था
पढ़े लिखों के बीच में,  वो अकेला नादान था
न परवाह उसे दुनिया की न रोज़ी की थी खबर
बैठा था कब्रिस्तान में, खोद रहा अपनी कब्र
ये हर मासूम का ऐसा अंजाम क्यों है
हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है

 "वैभव मैत्रेय"

Monday, 16 April 2012

जिंदगी एक सफ़र

आज डी टी सी की ऐ.सी बस में बैठ मै सोचने लगा की  ज़िन्दगी क्या है ! आज सोचा तो महसूस किया कि ये जिंदगी एक न ख़त्म होने वाला एक सफ़र है जो मेरे पैदा होते ही शुरू हो गया था !

पैदा होने के चंद मिनटों के बाद मुझे भी लिटा दिया गया बाकी एक दर्जन बच्चों के साथ,
मै चिल्लाया बुलाने अपनों को, बतलाने दुनिया को कि मै नहीं अनाथ !
फिर घर मुझे भी लाया गया और प्यार से ये समझाया गया
कौन हैं माँ बाप मेरे, ये बोलना सिखलाया गया
चंद साल भी गुज़रे न थे, मुझे माँ कि गोद में खेलते
बोलना ही सिखा था मै और लगे लोग मुझे ठेलते
पहुंचा मै भी स्कूल सिखने कुछ इंसानी असूल
छोड़ना था मासूमियत को अपनी और कहलवाना था कूल

साल पे साल यूँही बीत गए
ख़त्म हुई पढाई तो लगा जैसे कोई जंग जीत गए
लकिन ये क्या, ये तो सिर्फ अभ्यास था
ज़िन्दगी जीना सीखने का, मात्र एक प्रयास था
अब शुरू हुई एक नयी नौकरी पाने की तलाश
साबित करने की खुद को कि नहीं मै कोई जिंदा लाश
ताकत लड़ने कि मुझमे भी है
कुछ हासिल करना मुझको भी है
और इसी कोशिश में नजाने क्या क्या ले आया मै अपने साथ
एक बीवी और दो बच्चे, जुड़ गए कब मेरे साथ

चल रही है नौकरी, भर रही हम सब का पेट
जाने मै किस रहा चल रहा जो ना मिला आज तक एक्सिट गेट
लेकिन इन लोगों कि भीड़ में जब भी होती इश्वर से भेंट
सारे दुःख दर्द मिट जाते और दिल कहता god हो तुसी ग्रेट

आज सोचा तो महसूस किया कि ये जिंदगी एक न ख़त्म होने वाला एक सफ़र ही तो है