पत्थर में भी फूलों नें जगह पायी है
तेरे बिन हर गुलशन में भी तन्हाई है
चिरागों ने भी जो रौशनी न दी मुझे
तू उन्हें अपने दामन में भर लायी है
तेरे लबों का करूँ मैं क्या बयां
आज भी मेरी साँसों में तेरी गरमाई है
हर रात उलझ जाता हूँ तेरी ज़ुल्फ़ों में
ये सोच कर की दिन में घटाएँ छाई हैं
"मेरी प्यारी बीवी के लिए"
"वैभव मैत्रेय"
तेरे बिन हर गुलशन में भी तन्हाई है
चिरागों ने भी जो रौशनी न दी मुझे
तू उन्हें अपने दामन में भर लायी है
तेरे लबों का करूँ मैं क्या बयां
आज भी मेरी साँसों में तेरी गरमाई है
हर रात उलझ जाता हूँ तेरी ज़ुल्फ़ों में
ये सोच कर की दिन में घटाएँ छाई हैं
"मेरी प्यारी बीवी के लिए"
"वैभव मैत्रेय"