Friday, 11 November 2011

Ghar

घर क्या है ये समझना मुस्किल है
शायद आँगन खुशियों से परिपूर्ण

मगर सदस्यों का भी तो महत्व है
एक स्त्री एक पुरुष और एक दो छोटे छोटे बच्चे
शायद ये एक आदर्श घर है
मगर ये मात्र मेरी कल्पना है क्योंकि

घर कैसे है ये कहना मुश्किल है
प्यार, ममता, वात्सल्य, करुणा
ये घर के आंगन में खिले कुछ रंग बिरंगे फूलों की तरह हैं
जिनका आनंद घर का हर सदस्य भोगता है
मगर नफरत, स्वार्थ, एकाकी होना
इन फूलों में काँटों के सामान है शायद क्योंकि

घर क्यों है ये बताना है मुश्किल
सामाजिकता घर से शुरू होती है
माता का पुत्र के प्रति स्नेह, पिता का पत्नी के लिए निस्वार्थ प्रेम
एक देश को उन्नत बनाने और एक बड़े परिवार की स्थापना में सहायक है शायद

वैभव Maitreya

Ek Raat

सर्द रातों में गर्मी को खोजता रहा
दर्द नहीं था फिर भी चीखता रहा

चीख एक शुन्य में जाती रही
अनगिनत आवाज़े मुझे पास बुलाती रही

आवाजे कुछ जानी पहचानी सी लगी
एहसास का दर्द लिए गाती सी लगी

कुछ भी हो, गाना जो भी गा रहा था
शायद मुझे भी अपने पास बुला रहा था

जज्बातों की दुनिया में है एहसासों की कीमत
मगर खरीदना मेरे लिए नहीं है जायज़

वैभव मैत्रेय

Haalaat

देश में चारो तरफ मच रही है हाहाकार
देश के रक्षक ही कर रहे हैं देश में नरसंघार

प्यार और मोहोबत एक ही माँ के दो बच्चे हो गए हैं जुदा
हर इंसान का आज अलग है खुदा

बूढी माये बच्चो के बावजूद भी कहला रही हैं बाँझ
देश के पतन की होगई है साँझ

नौजवानों को देकर अलग वतन का वास्ता
नरसंघरियों ने दिखाया खून खराबे का रास्ता

जो कभी था सच्चा इंसान
आज वोह भी खड़ा है बेचने को ईमान

वैभव मैत्रेय

Lino ki vyaatha

कोरे कागज़ को अगर ध्यान से देखा जाये तो वोह कोरा नहीं होता ! कुछ लकीरे जिन्हें हम lines कहते हैं वे तो होती ही हैं ! फिर उन लइनो का भी अपना महत्व है ! किस लाइन में कौन जाने कितनी महत्वपूर्ण बात लिखी जानी है ! आप जानते हैं लाइने मुस्कराती भी हैं और रोना भी उनकी किस्मत में है ! जब कलम की नोक से घायल होती हैं तो दर्द का एहसास उन्हें भी होता है ! मगर मूक हैं बेचारी ! लेकिन मै लाइनों की भाषा जान गया हूँ ! एक दिन एक लाइन अपने को कॉपी से अलग कर बोली "क्या जमाना आगया है", अब तो लोग हमें भी खुश देखना पसंद नहीं करते !

ऐसी ऐसी बातो से लहुलुहान कर देते हैं की जख्म भरना भी मुस्किल हो जाता है ! मेरी कई सहेलियां जो आपनी किस्मत पर इतराया करती थी आज चिर निंद्रा में सो चुकी हैं

हम लोग जानते है की मनुष्य जाती स्वार्थियों से भरी है ! मगर मुझे ये सब कहने का कोई हक नहीं ! अब तो हमारे ऊपर लिखे गए शब्दों का असर हमारे व्यक्तित्व पर भी होने लगा है ! चाह कर भी हम कुछ नहीं कर सकते ! यहाँ तक की कोई हमारी करुण पुकार तक नहीं सुनता ! तुमसे न जाने कैसे जान पहचान हो गयी, शायद इश्वर की कृपा से हम तुम्हे अपने दुःख बताने में सफल हुए ! लेकिन अब मेरे दिल का बोझ थोडा हल्का हुआ है ! देखो अब जब तुम्हारी हमारी पहचान हो ही गयी है तो तुम्हे हमारा ध्यान रखना पड़ेगा ! हमारी तुम से गुजारिश है की हमारा दुरूपयोग मत होने देना ! वर्ना मेरी बीमार माँ स्वस्थ होने के बजाये मर जाएगी और उसके ज़िम्मेदार सिर्फ तुम होगे !  

Karz aur Farz

अपने क़र्ज़ और फ़र्ज़ को पूरा करने के लिए इंसान जन्म लेता है
जन्म के बाद वोह अपने क़र्ज़ और फ़र्ज़ से ही मुह मोड़ लेता है

मोह माया के बंधन में वोह कुछ नहीं सोचता
सिर्फ भोग विलास के साधन है खोजता

जब हो नहीं पाती उसकी मनोकामनाएं पूर्ण
वोह तैयार हो जाता है अपनाने को दुर्गुण

मंजिल दूर चली जाती है
और क़र्ज़ और फ़र्ज़ की बातें अगले जन्म के लिए रह जाती हैं

वैभव मैत्रेय

Wednesday, 9 November 2011

Bebasi

कुछ देखा बेबस लोगो को आज
कुछ समझे इस दुनिया के काज

क्यों दुखी ये संसार है
क्यों करता आदमी - आदमी पर वार है

क्यों पानी का रंग हो गया लाल
क्यों उड़ रहे सब ओर बवाल

क्यों बच्चे हैं सहमे गुमसुम
क्यों हर वक़्त किताबो में हैं गुम

क्यों रिश्तों का आभास नहीं
क्यों इंसान को इंसानों पर विश्वास नहीं

क्यों पैसा बन गया खुदा
क्यों हर कोई आपस में है जुदा

मै अक्सर यही सोचता हूँ
किस शख्स को यु खोजता हूँ

क्या ना होगा वोह भी इन जैसा
क्या नहीं चाहेगा वोह ये पैसा

कैसे उसे मै अपनाऊंगा
कैसे उसे मै समझाऊंगा

ना जाने होगा वोह बेबस कितना
चाहेगा जो वतन पे मिटना
फिर नहीं कहीं दुःख होगा
प्यार जब मज़हब होगा
लाल सिर्फ मेहँदी होगी
खुशाल हर जिंदगी होगी


बच्चे निरद्वंद होजाएगे
विद्द्यालय फिर मंदिर कहलायेंगे


हर रिश्ता अहम् बनजायेगा
जब प्रेम ध्वज लहराएगा


पैसे का कोई मूल्य न होगा
सीमाओं का जब अंतर न होगा
हर गृहसत भी फिर संत होगा
जब वात्सल्य का ना कोई अंत होगा


कुछ देखा बेबस लोगो को आज
कुछ समझे इस दुनिया के काज  

वैभव मैत्रेय

Tuesday, 8 November 2011

Asha

नदी के दो झिलमिलाते किनारे
चाहते है एक दुसरे को अलिंगंबध करना
मगर जानते है ये नहीं है मुमकिन

मिलन होगा मगर सागर में पहुँचकर
जहाँ किनारे अपना अस्तित्व खो देंगे


वैभव मैत्रेय
(मेरी ज़िन्दगी की पहली कविता)

Pragati

साधनों के आभाव में मानव ने प्रगति की
साधन सुलभ होते ही प्रगति रोक दी

जब ना था सुलभ साधनों का नाम
तब थोडा बहुत तो लेते ही थे मस्तिष्क से काम

सुलभ साधन जैसे ही पास आये
स्वस्थ व्यक्ति भी आलसी और बीमार नज़र आये

इसलिए साधनों के आभाव में जीना सीखे
साधन हो ना हो देश की प्रगति ना रोके

वैभव मैत्रेय

Monday, 7 November 2011

Kashmakash

एक कशमकश ज़रूरी है
थोडा मय को छल्काने के लिए

कोयला नहीं जुदा हीरे से
थोडा वक़्त ज़रूरी है उसे भी चमकाने के लिए

तुम जिस कशमकश में हो उलझे
वोह गैर ज़रूरी बात है
ये अँधेरा भी हो जायेगा फीका
ये छोटी सी काली रात है
गर अगर ये रात ना होती
थक कर फिर तुम कैसे सोती
सोना भी ज़रूरी है थोड़ी ताजगी के लिए

एक कशमकश ज़रूरी है
थोडा मय को छल्काने के लिए

हर ख़ामोशी ने सिखाया हालातों को झेलना
हर आंसू ने सिखाया मुस्काराहट बिखेरना
हर दुश्मन ने सिखाया दोस्ती को संभालना
हर बार नफरत ने सिखाया मोहबात बटोरना
तुम क्यों इस किनारे पर हो डूबे
दो बूँद पानी के लिए

एक कशमकश ज़रूरी है
थोडा मय को छल्काने के लिए

वैभव मैत्रेय