Thursday, 18 April 2013

फिर धमाको से है देहला, आज एक ओर शहर

फिर धमाको से है देहला
आज एक ओर शहर
फिर न जाने क्यों है बरपा
इन मासूमों पे कहर

ये नजाने कैसे लोग है
लगा कौनसा इन्हें रोग है
इंसानियत को बेच रहे
सिर्फ पैसे का इन्हें लोभ है

एक हिमाकत पे इनकी
लहू का दरिया बह चला
हाथ में लेकर फिर कटारी
चल पड़ा अब किस शहर

फिर धमाको से है देहला
आज एक ओर शहर
फिर न जाने क्यों है बरपा
इन मासूमों पे कहर

जो मर गए
वो मौन हैं
जो  बच गए
उनका कौन है
वो भी पड़े हैं सड़कों पर
एक बेजुबां लाश से
तैयार हो रही है लिस्ट
जनाब कल ही रात से

खून कौन सा है बह रहा
रगो में इनकी ऐ खुदा
क्यों ये इतने हैवान हैं
क्यों हैं हमसे जुदा
कौन से चश्में का पानी
पिलाती है इनकी नहर

फिर धमाको से है देहला
आज एक ओर शहर
फिर न जाने क्यों है बरपा
इन मासूमों पे कहर

गर एक माँ ही ने
इन्हें पैदा किया
क्यूँ ज़हर रगो में भर दिया
किन अंधेरों में हैं ये जी रहे
पहन कर काले लिबास
क्यों सुनाई ना दी इन्हें
किसी मासूम की आवाज़

फिर धमाको से है देहला
आज एक ओर शहर
फिर न जाने क्यों है बरपा
इन मासूमों पे कहर

"वैभव मैत्रेय"