कभी दो बूँद पानी के लिए
क्यों तूने अपने हैं लब सिये
मै वाकिफ था तेरी प्यास से
तन्हा था कई रात से
फिर मेरी किस बात पे
दिल के यूँ ये टुकड़े किये
ये दर्द कितना हसीन था
ना जुर्म ये कोई संगीन था
फिर क्यों मेरे जिस्म ओ जान पर
निगाहों से वार तूने किये
कुछ अहम सवाल थे तेरे पास
जिसे सोचकर है तू उदास
ये जो वक़्त गुज़र रहा सनम
नहीं मज़ा था इसमें भी कम
दो जिस्म थे बेज़ार से
हों जैसे दो जलते दिये
कभी दो बूँद पानी के लिए
क्यों तूने अपने हैं लब सिये
"वैभव मैत्रेय"
क्यों तूने अपने हैं लब सिये
मै वाकिफ था तेरी प्यास से
तन्हा था कई रात से
फिर मेरी किस बात पे
दिल के यूँ ये टुकड़े किये
ये दर्द कितना हसीन था
ना जुर्म ये कोई संगीन था
फिर क्यों मेरे जिस्म ओ जान पर
निगाहों से वार तूने किये
कुछ अहम सवाल थे तेरे पास
जिसे सोचकर है तू उदास
ये जो वक़्त गुज़र रहा सनम
नहीं मज़ा था इसमें भी कम
दो जिस्म थे बेज़ार से
हों जैसे दो जलते दिये
कभी दो बूँद पानी के लिए
क्यों तूने अपने हैं लब सिये
"वैभव मैत्रेय"