Thursday, 13 September 2012

ये तुम आज क्या जाने फरमा रहे हो

ये तुम आज क्या जाने फरमा रहे हो,
ना चाहते हुए भी करीब आ रहे हो

हर बार, पकड़कर, दामन ये मेरा,
मुझे अपनी दुनिया में ले जा रहे हो

 कहा मैंने दी है ख़ुशी कोई तुमको,
ये किस बात पे फिर इतरा रहे हो

ये तुम आज क्या जाने फरमा रहे हो,
ना चाहते हुए भी करीब आ रहे हो

अश्कों का मल्हम लगा ना सके हम,
ज़ख्मो को तुम अपने क्यों सुलगा रहे हो

नहीं कोई बोतल है आज मैकदे में
क्यों तुम ये ज़हर फिर पिए जा रहे हो

ग़मों का समंदर हमारे लिए था
क्यों दिल को तुम अपने डूबा रहे हो

 ये तुम आज क्या जाने फरमा रहे हो,
ना चाहते हुए भी करीब आ रहे हो

"वैभव मैत्रेय"

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