Monday, 11 March 2013

बड़ा अच्छा लगता है

तुमसे मिलना
साथ चलना
बड़ा अच्छा लगता है

कुछ न कहना
सुनते रहना
बड़ा अच्छा लगता है

"वैभव मैत्रेय"

तो आँसू छलक गए

सदियों के बाद
जो आये वो याद
तो आँसू  छलक गए

धड़का ये दिल
सुनके  तेरी आवाज़
तो आँसू छलक गए

रहो तुम आबाद
हुए हम बर्बाद
तो आँसू छलक गए

करने तेरा दीदार
लगी दीवानों की कतार
किया हमें जब शुमार
तो आँसू छलक गए

भूले सारे अपने गम
हुई नज़रें करम
तो आँसू छलक गए

न जाना इतनी दूर
ऐ मेरे हुज़ूर
कि होजाये हम मजबूर
और फिर आँसू छलक पड़ें

कहो मेरी कसम
मिलें हर एक जन्म
काश कहें फिर हम
कि आंसू किधर गए

"वैभव मैत्रेय"