गर न होती औरत
तो कहाँ से वजूद तेरा ही होता
गर न होती औरत
तो कौन तुझे बाप या दादा कहता
गर न होती औरत
तो कहाँ से ये संसार होता
न होती औरत अगर तो कैसे
जीवन का ये विस्तार होता
किस चाह ने ऐ इंसान
तुझे अँधा है किया
बिन सोचे ये किस राह पर
है तू चल दिया
क्यों बनी है आज दुश्मन
एक औरत ही औरत की
क्या जुर्म है उस बच्ची का
न दी इज़ाज़त जिसे तूने पैदा होने की
बनाया एक था
खुदा ने आदम और हव्वा को
न होगा आज भी मंज़ूर ये फरक
मेरे अल्लाह को
क्यों न काँपे थे तेरे हाथ
करके क़त्ल बच्ची का
क्या था कसूर बताओ
उस बिन पैदा हुई बच्ची का
मुमकिन था कि एक और "इंदिरा" हुई होती फिर पैदा
मुमकिन था फिर "शिवाजी" को भी करती कोई "जीजा" पैदा
हरबार तेरी इस हिमाकत पर
होगा वो भगवान् भी रोता
गर न होती औरत
तो कहाँ से वजूद तेरा ही होता
"वैभव मैत्रेय"
तो कहाँ से वजूद तेरा ही होता
गर न होती औरत
तो कौन तुझे बाप या दादा कहता
गर न होती औरत
तो कहाँ से ये संसार होता
न होती औरत अगर तो कैसे
जीवन का ये विस्तार होता
किस चाह ने ऐ इंसान
तुझे अँधा है किया
बिन सोचे ये किस राह पर
है तू चल दिया
क्यों बनी है आज दुश्मन
एक औरत ही औरत की
क्या जुर्म है उस बच्ची का
न दी इज़ाज़त जिसे तूने पैदा होने की
बनाया एक था
खुदा ने आदम और हव्वा को
न होगा आज भी मंज़ूर ये फरक
मेरे अल्लाह को
क्यों न काँपे थे तेरे हाथ
करके क़त्ल बच्ची का
क्या था कसूर बताओ
उस बिन पैदा हुई बच्ची का
मुमकिन था कि एक और "इंदिरा" हुई होती फिर पैदा
मुमकिन था फिर "शिवाजी" को भी करती कोई "जीजा" पैदा
हरबार तेरी इस हिमाकत पर
होगा वो भगवान् भी रोता
गर न होती औरत
तो कहाँ से वजूद तेरा ही होता
"वैभव मैत्रेय"