मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से
क्यों कतराते हैं फिर क्यों हम कुछ दूर साथ चलने से
खोये रहते है हर बार एक सोच को लेकर
है क्या फायदा बोलो कि बाद में हाथ मलने से
ये पल है अहम कितना ये कोई सोच कर देखे
बीत जायेगा ये भी कल उम्र के साथ ढलने से
मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से
सोचा है कई बार मैंने कि लौट आये वो गुज़रा वक़्त
मै जानता हूँ नहीं मुमकिन ये कोई भी चाल चलने से
बनाना रेत के टीलों पे वो आशियाँ अपना
उडा ले जाएँगी आंधियां, बचोगे सिर्फ संभल के चलने से
मोहोब्बत एक से करना ओर करना नफरत बाकियों से
नहीं लिखा किसी मजहब में कहीं भी ऐसा
मुमकिन है नसीब होजये जन्नत भी आज तुमको
नहीं है फायदा कोई अपने इमान से हटने में
कर हर आज वो तू काम जो लगता है तुझे अच्छा
न ज़रूरत बड़ा होने की, है बनकर रह तू बच्चा
"वैभव मैत्रेय"
क्यों कतराते हैं फिर क्यों हम कुछ दूर साथ चलने से
खोये रहते है हर बार एक सोच को लेकर
है क्या फायदा बोलो कि बाद में हाथ मलने से
ये पल है अहम कितना ये कोई सोच कर देखे
बीत जायेगा ये भी कल उम्र के साथ ढलने से
मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से
सोचा है कई बार मैंने कि लौट आये वो गुज़रा वक़्त
मै जानता हूँ नहीं मुमकिन ये कोई भी चाल चलने से
बनाना रेत के टीलों पे वो आशियाँ अपना
उडा ले जाएँगी आंधियां, बचोगे सिर्फ संभल के चलने से
मोहोब्बत एक से करना ओर करना नफरत बाकियों से
नहीं लिखा किसी मजहब में कहीं भी ऐसा
मुमकिन है नसीब होजये जन्नत भी आज तुमको
नहीं है फायदा कोई अपने इमान से हटने में
कर हर आज वो तू काम जो लगता है तुझे अच्छा
न ज़रूरत बड़ा होने की, है बनकर रह तू बच्चा
"वैभव मैत्रेय"
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