Friday, 30 November 2012

पुरानी खिड़की

आज देखा उस पुरानी खिड़की से झांकती तेरी दो आँखों को
आज फिर महसूस किया उन दर्द में डूबे तेरे जज्बातों को
आज ले आया  मैं अपने साथ फिर उन्हीं सर्द रातों को
आज फिर हुआ  मैं मदहोश पाके तेरी हसीन बाँहों को

क्यों नहीं है तू चाहती आना इन उजालों में
वो कौन शख्स है, खोई है तू जिसके ख्यालों में
क्या वजह है तेरी इस बेरूखी की बता
थाम ले हाथ मेरा, ना मुझे यूँ सता

कर यकीन तू मेरा, मैं तेरा ही तो साया हूँ
मान कहना, साथ अपने तुझे लेने आया हूँ

है मुझे भी थामना तेरे इन नाज़ुक हाथों को
आज फिर महसूस किया उन दर्द में डूबे तेरे जज्बातों को

आज ले आया मैं अपने साथ फिर उन्हीं सर्द रातों को

आज फिर हुआ मैं मदहोश पाके तेरी हसीन बाँहों को


"वैभव मैत्रेय"

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