Friday, 2 March 2012

आखें

यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए

तू आये पास चाहे ना ही सही
बंद आँखों से ही शायद तेरा दीदार हो जाये

एक पैमाना जैसे भर के छलकता हो कहीं
दो बूंद जाम हमें भी शायद आज मिल जाए

मै अपनी प्यास बयां  कैसे करूँ तुझसे बता
काश तेरी आखों से ही शायद आज पी पायें

एक खुमारी सी मेरी आँखों में नज़र आती है मुझे
नशे में इसके शायद तू  भी आज बहक जाए

कोई चेहरा नहीं आता नज़र तेरे आगे
आज क्यूँ ना ये वक़्त यहीं ठहर जाए

मेरे हाथों की लकीरों में तेरा नाम है यू लिखा
कोई पंडित ना जिसे कभी  भी पढ़ पाए

यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए

वैभव मैत्रेय

No comments:

Post a Comment