यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए
तू आये पास चाहे ना ही सही
बंद आँखों से ही शायद तेरा दीदार हो जाये
एक पैमाना जैसे भर के छलकता हो कहीं
दो बूंद जाम हमें भी शायद आज मिल जाए
मै अपनी प्यास बयां कैसे करूँ तुझसे बता
काश तेरी आखों से ही शायद आज पी पायें
एक खुमारी सी मेरी आँखों में नज़र आती है मुझे
नशे में इसके शायद तू भी आज बहक जाए
कोई चेहरा नहीं आता नज़र तेरे आगे
आज क्यूँ ना ये वक़्त यहीं ठहर जाए
मेरे हाथों की लकीरों में तेरा नाम है यू लिखा
कोई पंडित ना जिसे कभी भी पढ़ पाए
यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए
वैभव मैत्रेय
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए
तू आये पास चाहे ना ही सही
बंद आँखों से ही शायद तेरा दीदार हो जाये
एक पैमाना जैसे भर के छलकता हो कहीं
दो बूंद जाम हमें भी शायद आज मिल जाए
मै अपनी प्यास बयां कैसे करूँ तुझसे बता
काश तेरी आखों से ही शायद आज पी पायें
एक खुमारी सी मेरी आँखों में नज़र आती है मुझे
नशे में इसके शायद तू भी आज बहक जाए
कोई चेहरा नहीं आता नज़र तेरे आगे
आज क्यूँ ना ये वक़्त यहीं ठहर जाए
मेरे हाथों की लकीरों में तेरा नाम है यू लिखा
कोई पंडित ना जिसे कभी भी पढ़ पाए
यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए
वैभव मैत्रेय
No comments:
Post a Comment