Thursday, 17 May 2012

आवाजें

कुछ आवाजें कहीं दूर से आती थी जब 
गीत मै ही गाता, तुम गुनगुनाती थी तब 

न मिल पाना, फिर भी सोचना हम बिछड़े थे कब 
सोचना मेरा, बंद आँखों में कैद कर लू, न जाने दूंगा अब 
यही वो दौर था की ज़िन्दगी में तेरी कोई और था जब 

एक नशा रहता था मेरी भी इन आखों में 
न देखा तुमने बेशक, चाहा था हमने ने तुम्हे लाखों में 

वो जाना तेरा और न आना वापस फिर कभी 
छुटे संगी और साथी मेरे भी सभी 
हो गयी तुम मसरूफ अपनी दुनियां में 
खोया मै भी न जाने किन गलियों में 

न जाने कितना वक़्त यूँ ही बीत गया 
मै हारा सब कुछ औरं ये वक़्त मुझसे जीत गया 

फिर अचानक तकदीर मुझपे मेहरबान हुई 
फिर गूंजी मेरे विरानो में तेरी आवाज़ सुरमई 

फिर वही गीत देने लगे सुनाई मुझे 
दिल लगा तड़पने और नयन चाहते थे देखना तुझे 
शायद मेरे इंतज़ार का यही हश्र था होना 
मै करने लगा फिर इंतज़ार और  भूल गया सोना 

एक दिन मेरी आखों को न यकीं हुआ 
मै था हैरान, जब मुझे तुमने छुआ

"वैभव मैत्रेय "

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