Monday, 20 May 2013

अनुभूति

न जाने ये प्रेम कैसे
और कब हो जाता है
मानो ये जन्मो जन्मो
का कोई नाता है
एक नशीला जाम है
जो अक्सर
होटों के पास आकर के
छलक जाता है

वक़्त और उम्र
हो जाते हैं बेमानी
तब शुरू होती है
कोई प्रेम कहानी

दिल का दायरा
अपने आप बढ जाता है
पतझड़ भी फिर
सावन नज़र आता है
दिमाग कहाँ कुछ भी
सोच पाता है
चारो ओर सिर्फ तब
प्रेम नज़र आता है

"वैभव मैत्रेय"

गुज़रती है ज़िन्दगी

गुज़रती है ज़िन्दगी
कुछ इस अंदाज़ से
बचानी हो जैसे जान
चूहे को बाज़ से

ज़िन्दगी के चमन में
कांटे भी हैं जनाब
कब तक मुह छिपाईएगा
यूँ नकाब से

नशा आँखों से पीकर आपकी
उतना ही होता
क्यों प्यास फिर बुझाई
आपने शराब से

संभालना वो की
न फिर खानी पड़े ठोकर
फिर क्यूँ गिराया
गैरों की नज़रों में आपने

लगा कर दाग दामन पर
ढूंडना आब(पानी) को दर दर
यह वो कागज़ का दामन है
जो मिटजायेगा मिटाने से

"वैभव मैत्रेय"

सोचा कुछ बदला जाये

फिर से अपने को समेट कर
पहुँच गए हम फिर से घर
लगता नहीं अब कोई डर
गए जो अब फिर उस डगर 
कहीं हम न जाए मर

इसी पशोपेश में
एक और नए भेष में
न ही किसी तैश में

सोचा कुछ बदला जाये
खुद को फिर आज़माया जाये
उन काले अंधेरो से बहार
फिर अपने को लाया जाये

शायद दिया है एक ओर मौका
मेरे खुदा ने चलने का चाल
कैसे खेलूँगा मैं इस बार बाज़ी
अब है ये एक एहम सवाल

ये ज़िन्दगी नहीं कोई जुआ
शायद है शतरंज की बिसात
उस परवरदिगार के सामने
क्या है बन्दे की औकात

है शुक्रिया मालिक तुझे
ये ज़िन्दगी जो बक्शी मुझे
न चलूँगा फिर मैं उस डगर
फिर चाहे क्यूँ न जाऊ मर

"वैभव मैत्रेय"