Friday, 23 December 2011

जुदाई

तुम कहते हो हम गर जुदा हो जायेंगे तुम होगे थोडा मसरूफ और हम भूल जायेंगे

क्या मुमकिन है कभी करना साँसों को साँसों से जुदा
क्या मुमकिन है कभी करना आँखों से खवाब जुदा
क्या मुमकिन है कभी करना दिल को धड़कन से जुदा
क्या मुमकिन है कभी करना चाहत को मन से जुदा

गर नहीं ये सब मुमकिन तो मेरे महबूब बता
कैसे कर पाउँगा मै दिल के टुकड़े को दिल से जुदा

क्या तुम भूली मुझे, जब ना था मै पास में तेरे
क्या तुमने खोया मुझे एक पल भी, जब अपने थे तुम्हे घेरे
क्या ना सोचा कभी तुमने की काश तुम हो पाते मेरे
क्या ना चाहा कभी तुमने की दूर होजाएं ये अँधेरे

गर हुआ है अब तक यही तो मेरे महबूब बता
कैसे बसेगी अलग दुनिया, जब हमारा एक है खुदा


वैभव मैत्रेय 

Wednesday, 21 December 2011

फनाह

बहुत कम ऐसे लम्हे होते हैं जो यादगार बन जाते हैं ! और उनमें भी चंद पल ऐसे होते हैं जो याद आने पर आपकी आँखों में चमक और चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कराहट ले आये !

बात पंद्रह साल पहले की एक क्रिसमस पार्टी की है! अचानक अनू ने प्रोग्राम बनाया और गौरव और बरखा को चलने का आर्डर दे डाला ! अरे मै आप को बताना भूल गया, अनू गौरव की बॉस थी उस कंपनी में जहाँ वो अपने graduation के दिनों में शाम को पार्ट टाइम एक टेलेकाल्लिंग executive का काम किया करता था ! वो एक फ्री classified ad पेपर का ऑफिस था !

खैर, हम बात कर रहे थे उस क्रिसमस पार्टी की जो आज भी मुझे याद है ! अनू की invitation के बाद भी घर से permission मिलना बहुत ज़रूरी था ! गौरव ने घर पर बात की और उसकी उम्मीद के विपरीत उसे टाइम से लौटने की हिदायत के साथ permission मिल गयी, अब बारी थी बरखा की ! उसे भी इस शर्त पर जाने की अनुमति मिली की ऑफिस वालों से कहना की घर पर छोड़ कर जाए !

चूँकि पार्टी अनू की फ्रेंड की तरफ से सुंदर नगर में थी, थोड़ी ही देर में दो गाड़ियाँ सुन्दर नगर की तरफ दौड़ने लगी ! उस रात चारो तरफ सडकों पर धुंद ही धुंद छाई हुई थी  और ठण्ड भी काफी थी !  गौरव के ऑफिस से कुल ७ जने थे, बाकी सब पार्टी में अनजान लोग थे, लेकिन सब ने खूब डांस किया, एन्जॉय किया ! अचानक घडी की तरफ ध्यान गया और घडी में १२ बजे देख गौरव और बरखा के होश उड़ गए ! उन दिनों मोबाइल तो होता नहीं था जो घर में अपने लेट आने की information दे पाते! उन दोनों ने अनू से घर छुडवाने की request की और चलने को कहा ! एक - दो बार कहने पर अनू मान गयी ! लेकिन ये क्या हुआ, किसी ने एक गाडी के चारों tyres की हवा निकाल दी थी ! अब समस्या ये की इतने लोग एक जीप में कैसे adjust हों ! किसी तरह से सब adjust हुए और ये क्या बरखा को गौरव की गोदी में बैठना पड़ा! गौरव और बरखा अच्छे दोस्त थे और एक ही शिफ्ट में काम करते थे ! क्यूंकि बरखा को सबसे पहले घर छोड़ना था तो वो  गौरव की गोदी में बैठ गयी!

बरखा ने फर वाला coat पहना हुआ था, उसके coat से बड़ी भीनी भीनी खुसबू आ रही थी! उस सर्दी के मौसम में उसके शरीर की तपिश गौरव महसूस कर रहा था, उसका फर coat और वो perfume उसे कुछ मदहोश सा कर रहे थे! एक क्षण के लिए गौरव ने बरखा की मौन स्वीकृति महसूस की! वो कपड़ों के बीच गर्मी का एहसास दोनों के लिए ही नया था और शायद इसी लिए वो आँखे बंद किये गौरव की  jacket में अपने को समेटती रही ! अचानक जीप रुकी, driver ने धीरे से कहा मैडम आपका घर आगया !

वो बड़े अनमने मन से जीप से उतर गयी, वो बेनाम रिश्ता वहीँ फनाह हो गया और एक याद छोड़ गया हमेशा के लिए !

Monday, 19 December 2011

खवाइश

खवाइश क्या है आज क्या बतलाए तुमको हम
के हमने दुआ यही मांगी की मिट जाये तेरे सारे गम

तेरी मजबूरी को देख आज मै हैरान कितना हूँ
की तुझसे दूर होकर भी, मै तेरे पास कितना हूँ

तुम हर बार देती हो मेरे दिल पे  क्यों दस्तक
तेरी साँसे कर देती हैं मेरी धड़कने मधम

खवाइश क्या है आज क्या बतलाए तुमको हम

तेरे आँखों से पीकर आज हुए कुछ मदहोश हम
दिल चाहता है बस आना तेरी आगोश में सनम
एक प्यास थी अनजान सी, जो नहीं है आज तक बूझी
कहा जाता भला मै खोजने इस हाल में सनम


एक आंसू भी ना गिर पाया आज, इस सर्दी के आलम में
दो घूंट भी ना पी पाया मै, इस बर्फीले मौसम में
तेरे होने का हर वक़्त रहा कुछ एहसास इस कदर
सुबह जागा, थे होट सूखे और आँखे भी थी कुछ नम


खवाइश क्या है आज क्या बतलाए तुमको हम

वैभव मैत्रेय

Wednesday, 7 December 2011

चाहत का दर्द

कुछ वक़्त मुझे भी चाहिए आज मेरे लिए
एक हमदर्द कही मिल जाये मुझे आज मेरे लिए

दिल में एक दर्द का सैलाब है उठा
थोडा सा प्यार चाहिए मुझे आज मेरे लिए

हर शख्स को मेरी ही ज़रुरत होती क्यों है
एक हमराज़ मुझे भी चाहिए आज मेरे लिए

मेरा मुस्कराना मेरी आदत थी कभी
कुछ आंसू बहाने हैं मुझे आज मेरे लिए

कुछ वक़्त भी चाहिए मुझे आज मेरे लिए

मेरी ख़ामोशी को आज मुझ ही से छीन ले जो आकर
एक आवाज़ बुलंद चाहिए मुझे आज मेरे लिए

ना जाने क्यों होगया आज मजबूर में इतना
इस खौफ से उबरना है मुझे आज मेरे लिए

कुछ वक़्त मुझे भी चाहिए आज मेरे लिए

कुछ अन्धेरें आज ना जाने क्यों खींचे है मुझको
एक किरण चाहिए मुझे आज मेरे लिए

प्यास से क्यों सूख गया आज मेरा भी गला
दो बूँद पानी चाहिए मुझे आज मेरे लिए

कैसे बतलाऊ इन आखों में बहते हुए पानी का मतलब
इनको मोती है बनाना मुझे आज मेरे लिए

हर सांस पर मेरी तेरा नाम है खुदा
एक दुनिया नयी चाहिए मुझे आज मेरे लिए

कुछ वक़्त मुझे भी चाहिए आज मेरे लिए


वैभव मैत्रेय



Tuesday, 29 November 2011

Ehsaas

मै खोया हुआ था गहरी नींद की आगोश में
पाकर तुझे बाँहों में अपनी होगया मदहोश में

कैसे करूँगा मै बयां, वो आलम ही कितना खास था
दौलत न खरीद पाए, ये वो बेशकीमती एहसास था

मेरी साँसों को तेरी साँसों ने छुआ और मांगी हमने एक दुआ
वक़्त थम जाये वहीँ और तुझ में सिमट जाऊ मै

पाकर तुझे बाँहों में अपनी होगया मदहोश मै

उस आत्म मिलन की बेला में, सब शुन्य सा हो गया
मै तेज़ होती साँसों के बीच, तुझमे ही कही खोगाया

जिस्म बेशक न मिले पर आत्मा अब एक थी
चाहा फिर बस इतना मैंने, तेरी आगोश में सोजाऊ मै

पाकर तुझे बाँहों में अपनी होगया मदहोश मै
वैभव मैत्रेय

Friday, 25 November 2011

Haseen Sapna

एक कन्या कुवारी थी
वो तो लाखो पे भारी थी

हर दिल को अजीज़ थी
हर घर की दुलारी थी

उसकी चाल मतवाली थी
मेरे मित्र की वो साली थी

एक कन्या कुवारी थी

मिलवाया मुझे जिसने
वोह उसकी मामी थी

बाते हुई उससे
पर देती वो गाली थी

एक कन्या कुवारी थी

चेहरा ख़ूबसूरत था
और कानो में बाली थी

पहनी हुई उसने
वो ज़री वाली साडी थी

आखों में था कजरा
और होटों पे लाली थी

एक कन्या कुवारी थी

हर लड़के ने देख उसे
अपनी सासें थामी थी

एक बिजली गिरी जैसे
जब एक कन्या उसे..............मम्मी पुकारी थी

अब वो ना कन्या कुवारी थी
फिर भी मेरी आँखों में खुमारी थी

हुआ कुछ जादू था
और छाई बेकरारी थी

हडबडाकर जागा मै
और रह गयी अधूरी वो कहानी थी


वैभव मैत्रेय


Wednesday, 23 November 2011

Haal is desh ka

पुछा जो किसीने आज, हमें बतलाओ राज़
हाल क्या है समझाओ, हमें इस देश का

दिया जो जवाब मैंने, सहने पड़ेगे ताने
होगा शर्मिंदा हर नागरिक मेरे देश का

बोला वो अनजान मित्र, क्या है लोगो का चरित्र
थोडा बतलाओ मुझे, नागरिक हूँ मै भी इसी देश का

देश ने है की तर्राकि, नौकरी भी हुई पक्की
पास जिसके है पैसा, डोर थामे है वही इस देश का

पैसे की भी देखो माया, बेच रहे है लोग काया
अश्लीलता परोस रहा मीडिया इस देश का

गाड़ियां की भीड़ देखि, पैदल वाले की अनदेखी
लेटा ओढ़े सफ़ेद चादर आम आदमी इस देश का

नेताजी के कुरते की, ज़ेबें विचित्र देखि
फ़ैल हो गया है हर लोक्कर रिज़र्व बैंक का

नेता, अभिनेता सब मांगे जनता से भीख
नोट और वोट बनाते भविष्य इस देश का

रिश्तों का भी मोल भाव, कहीं धुप कहीं छाँव
कर रहा है माँ का भी सौदा, बेटा इस देश का

इमारतों की परिभाषा, चाँद छूने की भी आशा
रौंद रहा झोंपड़ियों को, समाज इस देश का

घर बनगया है फ्लैट, चाहिए सभी को हैट
पहना रहा है टोपियाँ, हर सक्षम इस देश का

बातें जो हुई मोबाइल, ना देख सकोगे तुम स्माइल
फैसबुक बना है जबसे प्रियतम इस देश का

सुन के ये सारी बातें, सुनी हो गयी हैं रातें
करवटों में खोज रहा बैचैन मनुष्य इस देश का

मै था अनजान अच्छा, फिर बन जाऊ बच्चा
परीपक्व होगया है बच्चा भी इस देश का



















Monday, 21 November 2011

Aagosh

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै

एक तेरी सुरमई आवाज़ का दीवाना हूँ मै
फिर वही ग़ज़ल गाना चाहता हूँ आज खामोश मै

तुम हो उलझी जिस कशमकश में बात वो संजीदा नहीं
सिर्फ यही यकीन दिलाना चाहता हूँ आज अफ़सोस मै
 

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै

हम तुम हुए थे जब जुदा वो लम्हा मुझे भुला नहीं
तुम फिर मिलोगी इस तरह था मैंने सोचा कभी नहीं


ये वक़्त का ही कोई खेल है, मेरा तेरा जो ये मेल है
तेरे ही खवाब चाहता हूँ आज देखना बेहोश मै


हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै


हर बार देखा मैंने तुझे अपने में ही डूबता
कहाँ खोजने जाता तुझे मै आज इस शोर में

जिस्म बेशक जुदा थे उस सफ़ेद चादर में सनम
आत्मा पर एक थी और भूले थे हम दुनिया के गम
होले से फिर तुमने कहा आज उसी जोश में

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै


वैभव मैत्रेय

Monday, 14 November 2011

Talash

ना जानते हुए भी हमेशा महसूस करता हूँ अपने चारो तरफ एक खुसबू
ये तो नहीं जानता की ये किसी के बदन की महक है या फिर प्रकृति ने अंगड़ाई ली है

कितनी ही बार महसूस किया की मेरा मन एक बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ता, दौड़ता ही जा रहा है
कितनी बार काबू में करना चाहता हूँ मन की इच्छाओं को,
मगर सब व्यर्थ नजर आता है

फिर एक नया ख्याल पैदा हुआ
क्या ये परिस्थितियां सब के जीवन में आती होंगी

ये तो मात्र एक, सिर्फ एक प्रश्न है
ना जाने ऐसे कितने ही प्रश्न रोज़ मेरे सागर रुपी मन की लहरों में उछलते बैठते रहते हैं !

पर सब या ज्यादातर का अंत या कहिये परिणाम शुन्य ही निकलता है

मुझे किसी ऐसे साथी की तलाश है जो मुझे दिशाहीन होने से बचा सके,
जो मुझे सहारा देकर हर कठ्नाई से लड़ने का !
कब समाप्त होगी ये तलाश ?

Friday, 11 November 2011

Ghar

घर क्या है ये समझना मुस्किल है
शायद आँगन खुशियों से परिपूर्ण

मगर सदस्यों का भी तो महत्व है
एक स्त्री एक पुरुष और एक दो छोटे छोटे बच्चे
शायद ये एक आदर्श घर है
मगर ये मात्र मेरी कल्पना है क्योंकि

घर कैसे है ये कहना मुश्किल है
प्यार, ममता, वात्सल्य, करुणा
ये घर के आंगन में खिले कुछ रंग बिरंगे फूलों की तरह हैं
जिनका आनंद घर का हर सदस्य भोगता है
मगर नफरत, स्वार्थ, एकाकी होना
इन फूलों में काँटों के सामान है शायद क्योंकि

घर क्यों है ये बताना है मुश्किल
सामाजिकता घर से शुरू होती है
माता का पुत्र के प्रति स्नेह, पिता का पत्नी के लिए निस्वार्थ प्रेम
एक देश को उन्नत बनाने और एक बड़े परिवार की स्थापना में सहायक है शायद

वैभव Maitreya

Ek Raat

सर्द रातों में गर्मी को खोजता रहा
दर्द नहीं था फिर भी चीखता रहा

चीख एक शुन्य में जाती रही
अनगिनत आवाज़े मुझे पास बुलाती रही

आवाजे कुछ जानी पहचानी सी लगी
एहसास का दर्द लिए गाती सी लगी

कुछ भी हो, गाना जो भी गा रहा था
शायद मुझे भी अपने पास बुला रहा था

जज्बातों की दुनिया में है एहसासों की कीमत
मगर खरीदना मेरे लिए नहीं है जायज़

वैभव मैत्रेय

Haalaat

देश में चारो तरफ मच रही है हाहाकार
देश के रक्षक ही कर रहे हैं देश में नरसंघार

प्यार और मोहोबत एक ही माँ के दो बच्चे हो गए हैं जुदा
हर इंसान का आज अलग है खुदा

बूढी माये बच्चो के बावजूद भी कहला रही हैं बाँझ
देश के पतन की होगई है साँझ

नौजवानों को देकर अलग वतन का वास्ता
नरसंघरियों ने दिखाया खून खराबे का रास्ता

जो कभी था सच्चा इंसान
आज वोह भी खड़ा है बेचने को ईमान

वैभव मैत्रेय

Lino ki vyaatha

कोरे कागज़ को अगर ध्यान से देखा जाये तो वोह कोरा नहीं होता ! कुछ लकीरे जिन्हें हम lines कहते हैं वे तो होती ही हैं ! फिर उन लइनो का भी अपना महत्व है ! किस लाइन में कौन जाने कितनी महत्वपूर्ण बात लिखी जानी है ! आप जानते हैं लाइने मुस्कराती भी हैं और रोना भी उनकी किस्मत में है ! जब कलम की नोक से घायल होती हैं तो दर्द का एहसास उन्हें भी होता है ! मगर मूक हैं बेचारी ! लेकिन मै लाइनों की भाषा जान गया हूँ ! एक दिन एक लाइन अपने को कॉपी से अलग कर बोली "क्या जमाना आगया है", अब तो लोग हमें भी खुश देखना पसंद नहीं करते !

ऐसी ऐसी बातो से लहुलुहान कर देते हैं की जख्म भरना भी मुस्किल हो जाता है ! मेरी कई सहेलियां जो आपनी किस्मत पर इतराया करती थी आज चिर निंद्रा में सो चुकी हैं

हम लोग जानते है की मनुष्य जाती स्वार्थियों से भरी है ! मगर मुझे ये सब कहने का कोई हक नहीं ! अब तो हमारे ऊपर लिखे गए शब्दों का असर हमारे व्यक्तित्व पर भी होने लगा है ! चाह कर भी हम कुछ नहीं कर सकते ! यहाँ तक की कोई हमारी करुण पुकार तक नहीं सुनता ! तुमसे न जाने कैसे जान पहचान हो गयी, शायद इश्वर की कृपा से हम तुम्हे अपने दुःख बताने में सफल हुए ! लेकिन अब मेरे दिल का बोझ थोडा हल्का हुआ है ! देखो अब जब तुम्हारी हमारी पहचान हो ही गयी है तो तुम्हे हमारा ध्यान रखना पड़ेगा ! हमारी तुम से गुजारिश है की हमारा दुरूपयोग मत होने देना ! वर्ना मेरी बीमार माँ स्वस्थ होने के बजाये मर जाएगी और उसके ज़िम्मेदार सिर्फ तुम होगे !  

Karz aur Farz

अपने क़र्ज़ और फ़र्ज़ को पूरा करने के लिए इंसान जन्म लेता है
जन्म के बाद वोह अपने क़र्ज़ और फ़र्ज़ से ही मुह मोड़ लेता है

मोह माया के बंधन में वोह कुछ नहीं सोचता
सिर्फ भोग विलास के साधन है खोजता

जब हो नहीं पाती उसकी मनोकामनाएं पूर्ण
वोह तैयार हो जाता है अपनाने को दुर्गुण

मंजिल दूर चली जाती है
और क़र्ज़ और फ़र्ज़ की बातें अगले जन्म के लिए रह जाती हैं

वैभव मैत्रेय

Wednesday, 9 November 2011

Bebasi

कुछ देखा बेबस लोगो को आज
कुछ समझे इस दुनिया के काज

क्यों दुखी ये संसार है
क्यों करता आदमी - आदमी पर वार है

क्यों पानी का रंग हो गया लाल
क्यों उड़ रहे सब ओर बवाल

क्यों बच्चे हैं सहमे गुमसुम
क्यों हर वक़्त किताबो में हैं गुम

क्यों रिश्तों का आभास नहीं
क्यों इंसान को इंसानों पर विश्वास नहीं

क्यों पैसा बन गया खुदा
क्यों हर कोई आपस में है जुदा

मै अक्सर यही सोचता हूँ
किस शख्स को यु खोजता हूँ

क्या ना होगा वोह भी इन जैसा
क्या नहीं चाहेगा वोह ये पैसा

कैसे उसे मै अपनाऊंगा
कैसे उसे मै समझाऊंगा

ना जाने होगा वोह बेबस कितना
चाहेगा जो वतन पे मिटना
फिर नहीं कहीं दुःख होगा
प्यार जब मज़हब होगा
लाल सिर्फ मेहँदी होगी
खुशाल हर जिंदगी होगी


बच्चे निरद्वंद होजाएगे
विद्द्यालय फिर मंदिर कहलायेंगे


हर रिश्ता अहम् बनजायेगा
जब प्रेम ध्वज लहराएगा


पैसे का कोई मूल्य न होगा
सीमाओं का जब अंतर न होगा
हर गृहसत भी फिर संत होगा
जब वात्सल्य का ना कोई अंत होगा


कुछ देखा बेबस लोगो को आज
कुछ समझे इस दुनिया के काज  

वैभव मैत्रेय

Tuesday, 8 November 2011

Asha

नदी के दो झिलमिलाते किनारे
चाहते है एक दुसरे को अलिंगंबध करना
मगर जानते है ये नहीं है मुमकिन

मिलन होगा मगर सागर में पहुँचकर
जहाँ किनारे अपना अस्तित्व खो देंगे


वैभव मैत्रेय
(मेरी ज़िन्दगी की पहली कविता)

Pragati

साधनों के आभाव में मानव ने प्रगति की
साधन सुलभ होते ही प्रगति रोक दी

जब ना था सुलभ साधनों का नाम
तब थोडा बहुत तो लेते ही थे मस्तिष्क से काम

सुलभ साधन जैसे ही पास आये
स्वस्थ व्यक्ति भी आलसी और बीमार नज़र आये

इसलिए साधनों के आभाव में जीना सीखे
साधन हो ना हो देश की प्रगति ना रोके

वैभव मैत्रेय

Monday, 7 November 2011

Kashmakash

एक कशमकश ज़रूरी है
थोडा मय को छल्काने के लिए

कोयला नहीं जुदा हीरे से
थोडा वक़्त ज़रूरी है उसे भी चमकाने के लिए

तुम जिस कशमकश में हो उलझे
वोह गैर ज़रूरी बात है
ये अँधेरा भी हो जायेगा फीका
ये छोटी सी काली रात है
गर अगर ये रात ना होती
थक कर फिर तुम कैसे सोती
सोना भी ज़रूरी है थोड़ी ताजगी के लिए

एक कशमकश ज़रूरी है
थोडा मय को छल्काने के लिए

हर ख़ामोशी ने सिखाया हालातों को झेलना
हर आंसू ने सिखाया मुस्काराहट बिखेरना
हर दुश्मन ने सिखाया दोस्ती को संभालना
हर बार नफरत ने सिखाया मोहबात बटोरना
तुम क्यों इस किनारे पर हो डूबे
दो बूँद पानी के लिए

एक कशमकश ज़रूरी है
थोडा मय को छल्काने के लिए

वैभव मैत्रेय

Saturday, 5 November 2011

Maan

तेरा मन मेरा मन एक जैसा सनम
मैंने लिया तुने लिया एक युग में जनम

मैंने देखा तुने देखा अजब बात हुई
मै तो भुला तू भी भूली क्यों दुनिया सनम

मेरे बीच तेरे बीच न कोई बात हुई
तेरी आँखों में क्यों देखा वो प्यार वाला नम

तेरा मन मेरा मन एक जैसा सनम
मैंने लिया तुने लिया एक युग में जनम

मेरे लब तेरी प्यास कब जुदा हुए
मेरी जान तेरा जिस्म कब थे एक सनम

चाहा मैंने चाहा तुने बस सुनते रहे एक दुसरे को हम
मेरी आँखे तेरी आँखे ही क्यों बस बोली सनम

तेरा मन मेरा मन एक जैसा सनम
मैंने लिया तुने लिया एक युग में जनम

मैंने दिन तुने रात बस किया इंतज़ार
जाना मैंने जाना तुने दिन ज़िन्दगी है चार
मै डूबा तू भी डूबी हुए मदहोश हम
मैंने किया तुने किया ना इंतज़ार कम

जानू मै ये जाने तूभी ना हम तुम हैं जुदा
तुभी पूजे मैभी पुजू हमारा एक है खुदा
तेरी दुनिया मेरी दुनिया चले साथ साथ हरदम

ना मिले तू ना मिलु मै क्या ये इतेफाक है
बीत जाए कोई नहीं चाहे ये जनम
मिलेंगे हम मिलोगे तुम फिर हर एक जनम

तेरा मन मेरा मन एक जैसा सनम
मैंने लिया तुने लिया एक युग में जनम

वैभव मैत्रेय

Tuesday, 1 November 2011

Andhera

Uga suraj, chaya Prakash, lo ho gaya savera
duba chand, kho gaye sitare, gum hua andhera

Baja alarm phir 5 baje ka chidiyon ne bhi daala dera
Garam garm  wahi chai ki chuski, jaise chusti ne paanv pasera

Phir baachon ki baari aayi, sabse pehle bitiya nahai
Uttha beta bhi aanke malta, band aankon se badan ko malta
Bhaagte daudte hum pahunche school, shayad tifin gaye phir se bhool
Hum bhi pahunche daftar apne, kaam ne phirse ghera
Uga suraj, chaya Prakash, lo ho gaya savera
duba chand, kho gaye sitare, gum hua andhera

Waqt phir thoda sa guzra. hum karne lage tera intezaar
Tumse guftgu karne ko dil phir hua yun bekaraar
Baatein hazaaron dil mein thi, par shabd kahan se lata
Teri baatein lag rahi thi aachi, mein aapni kab sunata
Ghante kab minto mein guzre, yeh kaun hamein batata
Dekh kar masroof itna, har mitr tumhe samjhata
Rishta to sirf ek hi hota, phir kaun sa hai yeh nata
Tumbhi khoyi unhi batiyon mein, kya mein nazar nahi aata
Har waqt sawalo ko kuch tum karti paida aur kuch apne aap hi aate
Bairang liffafe ke se woh bhi bin jawab hi laut jaate
Shayad yeh asar tha din ki uus tapis ka
Tumne jab anmane maan se haal baya kiya apne dil ka
Tumne chaha tha mutthi mein jis ret ko rokna
Ret nahi who zindagi thi meri, jise kathin tha sametna
teri kashmakas se mein bhi bakhoobi hoon wakif
Teri har umeed ko meine pehnaya ehtaraami chehra
Uga suraj, chaya prakash, lo ho gaya savera
duba chand, kho gaye sitare, gum hua andhera

Phir hui kuch shaam ki baatein, benaami mein naam ki baatein
Pene aur pilani waali, woh shayad aam thi baatein
Chahat meri bhi kuch boondein thi
Na chaha madiralay meine, pyas mujhe thi tumhe chune ki

Mere ghar pahunchte hi manzar yoon saara badal gaya
shayad mein ek neend mein tha aur metha sapna pighal gaya
Saamne the mere woh apne jo khudse bhi mujhe azeez hain
Karta hoon ibaadat mein jinki woh uus khuda hi ke rakeeb hain

Uga suraj, chaya prakash, lo ho gaya savera
duba chand, kho gaye sitare, gum hua andhera

Written by Vaibhav Maitreya

Thursday, 20 October 2011

Jaana pehchaana Ajnabi

Kal mujhsa mujhe mila koi
mulakaat hui kuch baat hui

Woh jo aksar mujhko milta tha
Thoda sa gumsum dikhta tha
Woh aaya tha tufano se guzarta hua
Khoya tha apne pita ko usne aur ban chuka tha khud pita

Kal mujhsa mujhe mila koi
mulakaat hui kuch baat hui

Hazaroon ki iis bheed mein
woh akela sab se junjhta
Local train ke dibbe mein, darwaje pe jhulta
Karta raha woh roz safar aur thame raha woh tooti dor

ek kadi na jaane kaha se ek din
usse pata mera de gayi
samay ki karwaton ke beech, usse mulakaat hui
woh dabi aawaz mein pooch baitha
kya hum ek jaise hain
mein hoon pat aur kya chit hai tu
kya hum sikke ke do pehlu jaise hai

Mein aaj jo itna shant hoon, yeh nahi ahenkaar mera
khaye hai baar baar zakham, yeh sirf hai teeraskaar mera
Meine tumko bhi aksar dekha hai
tere haath mein bhi woh rekha hai
Kalam to tu bhi chalata hai
hummein shayad yahi ek naata hai
Tu muskarakar peeta hai vish
aur mein ne kanth mein roka hai
Tu hai mere hi mulk ka
jise apno ne hi loota hai
Mujhe bhi lootne ka ehsaas hai
Aaj jo bhi mere paas hai
woh waqt ki hi gehri chaal hai
Meine bhi boojha boojha sa hoon
aur tera bhi haal behaal hai

Tu shayad kal phir aabad ho
par meine jo bhi kuch khoya hai
na lauta sakega koi khuda
mein ho gaya hoon jinse juda

Sunkar teri yeh dastan
mera dil na jaane kyu ro diya
yakinan hai hum ek mulk ke
tera dard bhi nahi hai mujhse juda

Kal mujhsa mujhe mila koi
mulakaat hui kuch baat hui

Written by Vaibhav Maitreya

Wednesday, 19 October 2011

Jeevan - ek paheli



Mera aana mera jaana, yeh mere bus ki baat nahi
Mein to ek kathputli hoon, jiski dor uparwale ne thami

Mujhe laya gaya auro ke liye,
Meine un auro se hazaroo waade kiye

Har shai pe mein muskarata raha
Hansi mein gumon ko chupata raha
jaanta hoon wajood nahi mera koi
Mera aana mera jaana, yeh mere bus ki baat nahi

Kabhi pyar se sehlaya gaya
Kabhi nafrat se dutkaara gaya
Mein ek kashti sa majdhar mein
Hawa ke jhonkon se behta gaya

Kabhi pedon ki ghani chaanv mein
Kabhi dhup waali fizaaon mein
Sulaya gaya aur jagaya gaya
Meine sirf maun suna, suni koi aawaz nahi
Mera aana mera jaana, yeh mere bus ki baat nahi

Tumhe bachpan se hoon dekhta
Sub kahen ki tum ho meri maa
par iis baat se mein hairaan hoon
thoda sa bechain hoon, thoda pareshan hoon
tumne sirf mere zakham dekhe, dawa na di tumne koi

Kya mein itna bura hoon sach bata
kyu na mujh par tujhe kabhi pyar aata
Mein bhi to tera ek aang hoon
Chahe aur kisi ke bhi sang hoon
Lekin kabhi suna hai tumne
Koi tehni vriksh se alag hui
Mera aana mera jaana, yeh mere bus ki baat nahi

Chuna nahi tha meine jinko, woh rishte sub kanhi kho gaye
Mein jaaga intezaar mein, woh chadar taan ke so gaye
Mein raat bhar rota raha aur yeh saara vishv sota raha
Kya zara bhi tumhe ehsaas hai
Meri muskarahat dekhi tune, mere aansuon ka kyu hisaab nahi

Ek pyaase fakir sa, mein talaash raha kis pyaar ko
Koi badhkar mujhe aawaz dega, mein taras raha uus pukaar ko
Guzra bahut seheron se mein, jaane kisi ki talash mein
Haaton mein ek dhaaga pakde, phool meine paye nahi
Mera aana mera jaana, yeh mere bus ki baat nahi

Hey ishwar tumhaara shukriya, joh di mujhe yeh zindaagi
jaana har ek mitr ko aur shatru ki pehcaan di
Mein khush hoon aaj yeh jaan kar
Teri rehmat sadaiv mujh par rahi

Mera aana mera jaana, yeh mere bus ki baat nahi
Mein to ek kathputli hoon, jiski dor uparwale ne thami

 Written by Vaibhav Maitreya

Monday, 17 October 2011

Kya Mausam hai,


 Kya Mausam hai,
kuch kam garmi aur kuch hawa bhi nam hai

Shwet gagan mein kaale parinde
kitna madhur inka vihangam hai.

surya ki lalima mein, oos ki kuch boonde dekhi
Gale mein ho pehna jaise motiyon ka haar ek
madhur sa sangeet suna kitna leharbadh hai

Kya mausam hai
kuch kam garmi aur kuch hawa bhi nam hai

Raat sirf ek chadar udhaar lekar kaati meine
jism jaise tawa ban gaya aur saas hui madham hai

charo taraf sub maun hai aur na hota koi kritya hai
palke moond kar ke dekha, pariyoon ka woh nritya hai
raat ka kaajal mita, uttha jaise surya krudh hai

Kya mausam hai
Kuch kam garmi aur kuch hawa bhi nam hai