Tuesday, 3 April 2012

अस्मत

काली अँधेरी रात में,
लम्बी खाली सड़क पर
चल पड़ा न जाने क्यों
मै अकेला परेशान सा
चारो तरफ ख़ामोशी थी
और न कहीं कोई इंसान था

माहोल कितना उदास था
न कोई भी मेरे पास था
सोचता सोचता
न जाने कहाँ तक आगया
अँधेरे में न जाने आज
मै कैसे भरमा गया

रोक कर कार अपनी
देख रहा था तारों को मै
कुछ होंट सूखे महसूस हुए,
तरसने लगा पानी को मै

फिर अचानक एक चीख से
टुटा वो सन्नाटा जो,
फिर किसी दरिन्दे ने,
लूटा जैसे किसी अस्मत को हो

एक गाडी तेज़ रफ़्तार ने
फेंका उसे कूड़े की तरह
न तन पे जिसके कोई लिबास था
सिमटी पड़ी थी वो मगर
लाचारी के उसका किसे एहसास था

देखते ही देखते
न जाने लोग कहाँ से आगये
ढक कर सफ़ेद चादर से उसे,
पुलिस स्टेशन पहुंचा गए
पुछा पुलिस वाले ने जो
उस अबला से पहला सवाल
काँप गयी रूह तक मेरी
मच गया ज़हन में बवाल
क्या नाम था तेरे यार का
बता किस से हुआ
तुझे प्यार था

वो सहमी ओर खामोश थी
न दिन, दुनिया की उसे होश थी
कुछ बोली भी न थी वोह अभी
चिलाया वो पुलिसवाला तभी
साला रोज़ का ही ये तमाशा है
कभी शीला, कभी मुन्नी ओर कभी आशा है

क्यों निकलती हो तुम सब रात में
अस्मत लुटवाने के लिया
जानती हो हैं जब घूमते
ये कुत्ते नोच खाने के लिए

वो कहती क्या ओर कहती किसे
सब व्यर्थ, सब बकवास था
लूट चूका था सबकुछ उसका
न बचा कुछ भी उसके पास था

फिर अचानक एक आवाज़ ने
रोक दी उस् की आखरी सांस भी
उठाकर पुलिस वाले के पिस्तोल से
ले ली उसने अपनी जान ही

मै कर नहीं पाया यकीन,
जो जुर्म था इतना संगीन
वो फाइल में बंद हो गया
बिना किसी गवाह के
वो केस रद्द हो गया
लूटते देखा एक संसार को
लेकिन मै भी लाचार था
न देखा था उन दरिंदों को मैंने
जिन्होंने किया ये व्यभिचार था

घूम रहे है वो दरिन्दे आज भी खुल्लेआम
कर रहे है न जाने कितनी अस्मतें नीलाम

"वैभव मैत्रेय"

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