गम ए वजूद ही न था, फिर क्यों रोये रात भर
करीब आये न कभी, बीती सारी ये उम्र
शौंक ही शौंक में हम पीते रहे
थामा हाथ न कभी, न देखा एक ही नज़र
गम ए वजूद ही न था
मुफलिसी में तुम रहते अक्सर करीब थे
मिली दौलत जो तुम्हे, क्यों फेरली अपनी नज़र
गम ए वजूद ही न था
"वैभव मैत्रेय"
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