Friday, 14 June 2013

चंद लम्हे प्यार के

चंद लम्हे प्यार के
मांग खुदसे उधार में
कुछ वक़्त गुज़रा
जो तुम्हारे साथ
लेकर के हाथों में हाथ
मेरी ज़िन्दगी जैसे
थम गयी
तेरी तेज़ चलती गर्म सांसे
मेरी सांसो में फिर रम गयी

नहीं कोई था
जहाँ दरमियाँ
थी प्यार की
बस नर्मियाँ
करता रहा सदके
ये दिल तेरे दीदार के
चंद लम्हे प्यार के
मांग खुदसे उधार में

मौसम भी कुछ
मस्त था
फिज़ाओं में
बारिश का
गश्त था
हम तुम थे जब
बादलों के पार
कानों में कुछ शोर करती
थी वो क्या मदमस्त फुहार
बादलों  ने डाले गले में
सफ़ेद रेशमी वो हार थे

"वैभव मैत्रेय"