Wednesday, 27 June 2012

है नहीं कोई तीसरा

क्या फर्क है दो इंसानों में
एक शांत है, एक अशांत है

हैं दोनों दिखते एक जैसे ही
एक अमीर है, एक गरीब है

चीखते दोनों ही हैं
एक दर्द देकर, एक दर्द पाकर

है भूख भी दोनों ही को
इसे पैसे की, उसे रोटी की

है प्रेम एक सामान भी
देदें अपनों के लिए जान भी

निर्दई भी है एक से
एक बचने के लिए और एक मारने के लिए

लेकिन यह कौन है जो है तीसरा
जो गरीबी में भी शांत है
न जिसका कोई देश है, न जिसका कोई प्रान्त है
ना पैसे का जिसे घमंड कोई
सोता है खा कर रोटी दो ही
है दर्द अपने में समेटे हुए
जला रहा प्रेम के दिए
है मारना जिसने सिखा नहीं
है जीवन मृत्यु से परे कहीं

मगर मै कैसे उसे खोजता
रहता ता उम्र यही सोचता
कि क्या वो सिर्फ मेरे ख्यालों में है
इन अनसुलझे सवालों में है

मै इसी उधेड़ बुन में था
कि आवाज़ दी सुनाई मुझे
कि क्यों हो इतना परेशान तुम
है जरुरत न करने की कोई जतन
ये तीसरा हम सभी में है
आदि से अंत तक हर सदी में है
ये बीज है उसी ईश का
जिसने तुम्हे ये जीवन दिया
ना कहीं कोई दो ही थे और ना तीसरा कहीं पैदा हुआ
हैं लड़ रहे हैं खुदी से हम
हो गए एक से दो हम
और कितनी अजीब बात है
जिस तीसरे को हम खोज रहे
वो हम ही में विद्यमान है

"वैभव मैत्रेय "

Tuesday, 26 June 2012

Creativity has no limits: ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा

Creativity has no limits: ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा: मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से क्यों कतराते हैं फिर क्यों हम कुछ दूर साथ चलने से खोये रहते है हर बार एक सोच को लेकर है क्या...

रात भर पिघलती रही ज़िन्दगी शबनम की तरह

एक ख्याल तेरा मुझे तेरे पास ले आया
रात भर पिघलती रही ज़िन्दगी शबनम की तरह

एक तेरे दीदार को जानिब हम तरसते रहे
कोई अपना आज हमे, अपनों से जुदा कर आया
ये शाम आज और भी हो सकती थी हसीन 
कोई सपना दिखा कर अपनों का , मेरी हँसी भी ले आया

बातों के दौर चलते रहे रंगीन बोतलों के साथ, हर एक शक्स मशगूल था वहां मेरे सिवा
मुझे नशा तेरी आँखों का था, मै आँखों से पी आया

एक ख्याल तेरा मुझे तेरे पास ले आया

उठ रहे थे तूफ़ान दिल में, न बाहर कोई शोर था
आँखों में मेरी चमक थी और चेहरे पे तेरा नूर था

इसी खींच तान में, समेट कर अपने को मै
चल पड़ा घर की तरफ, मै एक गुमनाम सा
गुज़रे चंद पल ही थे, लेकिन लगा मुझे क्यों जैसे
मै इन चंद साँसों में अपनी ज़िन्दगी जिआया

होता अक्सर यहीं है और बात भी सही है
नहीं होती हो तुम जब करीब, रहता है साथ तेरा साया

एक ख्याल तेरा मुझे तेरे पास ले आया
रात भर पिघलती रही ज़िन्दगी शबनम की तरह

"वैभव मैत्रेय"

Monday, 25 June 2012

ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा

मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से
क्यों कतराते हैं फिर क्यों हम कुछ दूर साथ चलने से

खोये रहते है हर बार एक सोच को लेकर
है क्या फायदा बोलो कि बाद में हाथ मलने से

ये पल है अहम कितना ये कोई सोच कर देखे
बीत जायेगा ये भी कल उम्र के साथ ढलने से

मै वाकिफ हूँ ज़िन्दगी के न दोबारा मिलने से

सोचा है कई बार मैंने कि लौट आये वो गुज़रा वक़्त
मै जानता हूँ नहीं मुमकिन ये कोई भी चाल चलने से

बनाना रेत के टीलों पे वो आशियाँ अपना
उडा ले जाएँगी आंधियां, बचोगे सिर्फ संभल के चलने से

मोहोब्बत एक से करना ओर करना नफरत बाकियों से
नहीं लिखा किसी मजहब में कहीं भी ऐसा
मुमकिन है नसीब होजये जन्नत भी आज तुमको
नहीं है फायदा कोई अपने इमान से हटने में

कर हर आज वो तू काम जो लगता है तुझे अच्छा
न ज़रूरत बड़ा होने की, है बनकर रह तू बच्चा

"वैभव मैत्रेय"