Monday, 7 May 2012

एक अजीब वाकया

एक अजीब वाकया मेरे साथ आज हुआ 
एक शख्स ने टोका मुझे 
तो मुझे ये एहसास हुआ 
कि कोई बैठा था मेरे पास अपने में मशगूल 
मेरा छुना बन गया जैसे कोई शूल 

ऐसा कभी नहीं हुआ था पहले कभी 
कितने रहते हैं एक बस में यात्री सभी 
मेरा ध्यान कभी नहीं भंग किसी ने किया
फिर अचानक इन भद्र महिला को ये क्या हुआ 

मै लगा सोचने की वो इतनी परेशान क्यों है 
लोगो की भीड़ में लोगों ही से अनजान क्यूँ है 
कुछ तो बात है जिसने उसे परेशान है किया 
क्या किसी हादसे ने ऐसा उसे बना दिया 
मै अपने को अपने में समेटने लगा 
सोचा लिखू या न लिखू ये जो अचानक था हुआ 

फिर शायद वो अपनी बेवजह कहने का सबब जान गयी 
मै कितना हूँ परेशान शायद पहचान गयी 
वो उठी ओर चुपचाप चली गयी 
अब न शिकवा ओर न ही कोई शिकायत थी नयी 
लिखना तो मै शुरू कर ही चूका था 
अब तो सिर्फ बयां ही करना बचा था 
फिर कहाँ मैंने कभी कुछ छोडा है अधुरा 
आखिर इस वाकया को भी यहीं करता हूँ पूरा 

कि कुछ लोग न जाने इतने परेशान क्यों है 
अपने होने का उन्हें इतना गुमान क्यों है 
क्यों नहीं वो करते है मोहोब्बत सबसे 
क्यों पाल रहे है ये बिन बात के नफरत कबसे 

तुम भी सोचोगे की क्या ज़रुरत थी ये सब बयां करने की 
उन मर चुके जिस्मों के साथ खुद भी मरने की 

मेरा मकसद आज सिर्फ इतना है 
ये जो माहोल आज संगीन इतना है 

क्यों ना रोके कोई आज ये आखों से लहू बहने से 
क्यों झिजक्ति है कोई बहू आज अपने को बेटी कहने से 
कहीं ऐसा तो नहीं ये ज़ख्म अपनों ने ही हो दिए 
घर के चिराग ने ही कहीं न बुझाये हो ये दिए 

एक अजीब वाकया मेरे साथ आज हुआ

"वैभव मैत्रेय"