एक अजीब वाकया मेरे साथ आज हुआ
एक शख्स ने टोका मुझे
तो मुझे ये एहसास हुआ
कि कोई बैठा था मेरे पास अपने में मशगूल
मेरा छुना बन गया जैसे कोई शूल
ऐसा कभी नहीं हुआ था पहले कभी
कितने रहते हैं एक बस में यात्री सभी
मेरा ध्यान कभी नहीं भंग किसी ने किया
फिर अचानक इन भद्र महिला को ये क्या हुआ
मै लगा सोचने की वो इतनी परेशान क्यों है
लोगो की भीड़ में लोगों ही से अनजान क्यूँ है
कुछ तो बात है जिसने उसे परेशान है किया
क्या किसी हादसे ने ऐसा उसे बना दिया
मै अपने को अपने में समेटने लगा
सोचा लिखू या न लिखू ये जो अचानक था हुआ
फिर शायद वो अपनी बेवजह कहने का सबब जान गयी
मै कितना हूँ परेशान शायद पहचान गयी
वो उठी ओर चुपचाप चली गयी
अब न शिकवा ओर न ही कोई शिकायत थी नयी
लिखना तो मै शुरू कर ही चूका था
अब तो सिर्फ बयां ही करना बचा था
फिर कहाँ मैंने कभी कुछ छोडा है अधुरा
आखिर इस वाकया को भी यहीं करता हूँ पूरा
कि कुछ लोग न जाने इतने परेशान क्यों है
अपने होने का उन्हें इतना गुमान क्यों है
क्यों नहीं वो करते है मोहोब्बत सबसे
क्यों पाल रहे है ये बिन बात के नफरत कबसे
तुम भी सोचोगे की क्या ज़रुरत थी ये सब बयां करने की
उन मर चुके जिस्मों के साथ खुद भी मरने की
मेरा मकसद आज सिर्फ इतना है
ये जो माहोल आज संगीन इतना है
क्यों ना रोके कोई आज ये आखों से लहू बहने से
क्यों झिजक्ति है कोई बहू आज अपने को बेटी कहने से
कहीं ऐसा तो नहीं ये ज़ख्म अपनों ने ही हो दिए
घर के चिराग ने ही कहीं न बुझाये हो ये दिए
एक अजीब वाकया मेरे साथ आज हुआ
"वैभव मैत्रेय"