Thursday, 4 July 2013

प्यासा था वो फ़क़ीर और प्यासा ही मर गया

प्यासा था वो फ़क़ीर
और प्यासा ही मर गया
बैठा जो दरिया के पास था
वो कैसे मर गया

करता रहा वो इंतज़ार
अल्लाह के आने का
जब किसी ने न दी ज़कात
तो  बदनसीब मर गया

दिए थे कई मौके, खुदा ने भी उसे
देने आया था पानी, एक बच्चा जब उसे
पहचान नहीं पाया उस फ़रिश्ते को वो कभी
गवांता रहा हरबार वो मौके भी सभी

"वैभव मैत्रेय"

न मैंने ही कोशिश की

कुछ यादों पे मेरी ज़िन्दगी टिकी रही
न उसे ही याद आया
न मैंने ही कोशिश की

हर आहट पे लगा वो आगये
न मंजिल उसे मिली
न मैंने ही कोशिश की

"वैभव मैत्रेय"
 

वो गिला भी करतें हैं गैरों की तरह

वो गिला भी करतें हैं गैरों की तरह
वो आतें हैं हरबार लहरों की तरह
मेरी ख़ामोशी की भी एक कहानी है
नहीं पाओगे हमें हजारों की तरह

"वैभव मैत्रेय"
 

Tuesday, 2 July 2013

ना तुम थे कभी मेरे करीब....ना तुम्हे ही मैंने बनाया नसीब...

पाल रहा था एक सपना
जाने कितने साल से
आज आखिर निकल गया
वो तीर जो था कमान पे

चलो ये भी खूब रही
आखिर आपने ही कही
वो सपना था
उसे भूल जा
जान ले है यथार्थ क्या

मैं हूँ वो अप्सरा
जो आ सकती है सिर्फ ख्वाब में
मैं वो निराला फूल हूँ
जो खिला है गैर के बाग़ में

तुम नहीं मेरी दुनियाँ से हो
फिर क्यों दुखी हो ये कहो

क्यों आज तक हो पकडे
तुम मेरी परछाई को
क्यों बनाये बैठे हो तुम
इस किले हवाई को

मैं खुश हूँ अपनों के बीच
रही हूँ जिस ज़मीन को सींच
वो ही मेरा देश है
तू भी जा अब अपनों के बीच
क्यों बनाया ये भेष है

बीत गया वो काल है
और आज ये एहम सवाल है
ना तुम थे कभी मेरे करीब
ना तुम्हे ही मैंने बनाया नसीब

हम सिर्फ एक सफ़र में थे
और हँसके थोड़ी बात की
मेरा मकाम जब आगया
तो मैं वक़्त की मोहताज थी

चलो ये भी खूब रही
आखिर आपने ही कही

"वैभव मैत्रेय"