Tuesday, 17 April 2012

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

ये कैसी हैं निगाहें जो नोचें है हर बदन
ये किसकी है चीख, ये किसका है रुदन
हर दिल आज लहुलुहान सा क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

ये कैसी गफलत में आज जी रहे हैं सभी
ये कौन सा विष बेखौफ पी रहे है सभी
ये बाप, बेटी का बनने से परेशान क्यों है
ये घर का मसीहा, बहार हैवान क्यों है
कौन पहचानेगा अपनों को और परायों को
कौन बांचेगा मौत के इन फरमानों को
कौन बचाएगा अस्मत आज बच्ची की मेरी

हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है
हर बच्ची अपनी पहचान से आज परेशान क्यों है

एक रोज़ दीवाना एक देखा मैंने
दुनिया के कायदों से अनजान था वो
देख इंसानी दरिंदों को पशेमान था वो
लूटा था भीड़ ने एक रोज़ सब कुछ उसका
अब न दर था न दरबान, सिर्फ एक उजड़ा मकान था
पढ़े लिखों के बीच में,  वो अकेला नादान था
न परवाह उसे दुनिया की न रोज़ी की थी खबर
बैठा था कब्रिस्तान में, खोद रहा अपनी कब्र
ये हर मासूम का ऐसा अंजाम क्यों है
हर आँख में नस्तर, हर हाथ में नाखून क्यों है

 "वैभव मैत्रेय"

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