Friday, 12 April 2013

अकेला

एक बस स्टॉप पर
कई आवाजों के बीच
मैं अकेला ही खड़ा था
तुम्हारे इंतज़ार में

तेज़ आती रौशनी से
फिर अचानक चौका मैं
ना अब भी आई थी तुम
सिर्फ यादें थी तुम्हारी

और फिर वही शोर
खींचे था जो अपनी ओर

मैं थोडा परेशान सा
आपस के चेहरों से
बिलकुल अनजान सा
भरी बस में यूँ चढ़ गया
जैसे कहीं कोई जुमला
बिन कहे ही मर गया

तभी बज उठा ये फ़ोन
तोड़ कर सारे मौन
कानो में कुछ कह गया
सुनकर के तेरी आवाज़ मैं
जाने किस रौह में बह गया

अब कहाँ अकेला था मैं
तेरे सपनों ही से बहला था मैं

रात भर करता रहा
सिर्फ एक तेरा दीदार
महसूस हुआ ये मुझे
तुम आई थी बनकर बहार
तुमने ही तो डाले थे मेरे
गले में बाँहों के हार

"वैभव मैत्रेय"