एक बस स्टॉप पर
कई आवाजों के बीच
मैं अकेला ही खड़ा था
तुम्हारे इंतज़ार में
तेज़ आती रौशनी से
फिर अचानक चौका मैं
ना अब भी आई थी तुम
सिर्फ यादें थी तुम्हारी
और फिर वही शोर
खींचे था जो अपनी ओर
मैं थोडा परेशान सा
आपस के चेहरों से
बिलकुल अनजान सा
भरी बस में यूँ चढ़ गया
जैसे कहीं कोई जुमला
बिन कहे ही मर गया
तभी बज उठा ये फ़ोन
तोड़ कर सारे मौन
कानो में कुछ कह गया
सुनकर के तेरी आवाज़ मैं
जाने किस रौह में बह गया
अब कहाँ अकेला था मैं
तेरे सपनों ही से बहला था मैं
रात भर करता रहा
सिर्फ एक तेरा दीदार
महसूस हुआ ये मुझे
तुम आई थी बनकर बहार
तुमने ही तो डाले थे मेरे
गले में बाँहों के हार
"वैभव मैत्रेय"
कई आवाजों के बीच
मैं अकेला ही खड़ा था
तुम्हारे इंतज़ार में
तेज़ आती रौशनी से
फिर अचानक चौका मैं
ना अब भी आई थी तुम
सिर्फ यादें थी तुम्हारी
और फिर वही शोर
खींचे था जो अपनी ओर
मैं थोडा परेशान सा
आपस के चेहरों से
बिलकुल अनजान सा
भरी बस में यूँ चढ़ गया
जैसे कहीं कोई जुमला
बिन कहे ही मर गया
तभी बज उठा ये फ़ोन
तोड़ कर सारे मौन
कानो में कुछ कह गया
सुनकर के तेरी आवाज़ मैं
जाने किस रौह में बह गया
अब कहाँ अकेला था मैं
तेरे सपनों ही से बहला था मैं
रात भर करता रहा
सिर्फ एक तेरा दीदार
महसूस हुआ ये मुझे
तुम आई थी बनकर बहार
तुमने ही तो डाले थे मेरे
गले में बाँहों के हार
"वैभव मैत्रेय"