Friday, 15 June 2012

मजबूरी

मजबूरी भी इंसान को कितना मजबूर करती है
न चाहते हुए भी ना जाने कितनो से दूर करती है

न मालूम कब, कैसे, कौन, कहाँ मजबूर हो जाये
न जाने ये वक़्त जो हसीं था, कब ग़मगीन हो जाये

कई बार लगता है कि मजबूर करना भी वक़्त की ही एक चाल है
मेरे ज़हन में ये आज फिर एक अहम सवाल है
कि क्या वजह है इस ताने बाने को बुनने की
कैसे हो जातें हैं कई बार इतने मजबूर हम
क्यों लगने लगती है ये दुनिया छोटी और बड़े अपने गम

ये मजबूरी उस वक़्त कहाँ थी कि जब मै बहुत खुश था
कहाँ गए वो दोस्त जिन के लिए कभी मै सब कुछ था
क्या वो भी कर रहे थे इंतज़ार मेरे मजबूर होने का
अपनों से हो कर के जुदा, मेरा अपनों के लिए रोने का

क्या बताऊ मै आज मजबूर कितना हूँ
किसे बताऊ कि मै दुखी कितना हूँ
काश ये वक़्त फिर एक बार बदल जाए
मेरी रूठी हुई तकदीर फिर से संवर जाए
चाल ये शै वाली जीत में फिर बदल जाए

ये खेल हर बार वक़्त यूँही खेलता है
हर बार मारा वक़्त का ये सब झेलता है
बात अजीब है कि मै ये हर बार खुद भी जानता हूँ
इश्वर की सत्ता को भी पूरी तरह मानता हूँ
हर रात के बाद होगा उजाला ये भी जानता हूँ
लेकिन है सबसे वक़्त ही बड़ा ये भी मानता हूँ

मजबूरी भी इंसान को कितना मजबूर करती है
न चाहते हुए भी ना जाने कितनो से दूर करती है

"वैभव मैत्रेय"


Wednesday, 13 June 2012

तेरे चेहरे में

तेरे चेहरे में वो नूर नज़र आता है
हर बात पर ये दिल आज भी बहल जाता है
शक्ल बेशक हैं इंसानों की
वजूद में तेरे मुझे भगवान् नज़र आता है

याद है क्या तुमको वो बरसात की रात
सर्दी का सा मौसम और आपका साथ
डूबे निगाहों में एक दूसरे की, थामे हुए हाथ
जवां होती उमंगें और मचलते जज़्बात
आज भी वो मंज़र बहुत याद आता है
तेरे चेहरे में वो नूर नज़र आता है
हर बात पर ये दिल आज भी बहल जाता है

हवा के झोंके सा हर बार तेरा आना ओर गुम हो जाना
कानो में कुछ बुदबुदाना और फिर खामोश हो जाना
जगाना रातों को, अपनी यादों में और खुद सो जाना
करके इज़हार हर बार, हमसे इनकार करवाना
इस सलीका ए मोहोब्बत से में वाकिफ नहीं हूँ
इबादत करता हूँ मै तेरी, कोई काफिर नहीं हूँ
थोडा मसरूफ हूँ ज़रूर दुनियादारी में
लेकिन एक लम्हा भी तेरे ख्याल से गाफिल नहीं हूँ

"वैभव मैत्रेय"