Friday, 24 February 2012

रेगिस्तान में फूल

एक अरसे के बाद खिला जब रेगिस्तान में फूल
बरसा मेघ उमड़ घुमड़ के, गर्मी हम फिर गए भूल

रेत के गर्म टीले बन गए ओस की ठंडी चादर
ख़त्म हुई तलाश पानी की, गोरी ने भरली गागर

पेड़ खड़े थे ठूंट से जो, आज हरे फिर होगये
पेट भर फलों को खाया और चादर तान के सोगये

ये जो सुरमई सी शाम है, ये आज तेरे नाम है
हम ने ढूंडा दिन रात जिसे वो आपका ही नाम है

क्या करूँ मै बयां, वो दिन भी कितने अजीब थे
दुनिया मेरे पीछे थी और हम तेरे रकीब थे

हर वक़्त तरसा मै सनम एक बूँद पानी के लिए
न निकला एक शब्द मुह से, जैसे होट अपने थे सिये

पड़ा रहा मै रेत पर उस कटीले झाड सा
न जिसका था कोई माली, बियाबान में उजाड़ सा

एक अरसे के बाद खिला जब रेगिस्तान में फूल
बरसा मेघ उमड़ घुमड़ के, गर्मी हम फिर गए भूल

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