Wednesday, 13 June 2012

तेरे चेहरे में

तेरे चेहरे में वो नूर नज़र आता है
हर बात पर ये दिल आज भी बहल जाता है
शक्ल बेशक हैं इंसानों की
वजूद में तेरे मुझे भगवान् नज़र आता है

याद है क्या तुमको वो बरसात की रात
सर्दी का सा मौसम और आपका साथ
डूबे निगाहों में एक दूसरे की, थामे हुए हाथ
जवां होती उमंगें और मचलते जज़्बात
आज भी वो मंज़र बहुत याद आता है
तेरे चेहरे में वो नूर नज़र आता है
हर बात पर ये दिल आज भी बहल जाता है

हवा के झोंके सा हर बार तेरा आना ओर गुम हो जाना
कानो में कुछ बुदबुदाना और फिर खामोश हो जाना
जगाना रातों को, अपनी यादों में और खुद सो जाना
करके इज़हार हर बार, हमसे इनकार करवाना
इस सलीका ए मोहोब्बत से में वाकिफ नहीं हूँ
इबादत करता हूँ मै तेरी, कोई काफिर नहीं हूँ
थोडा मसरूफ हूँ ज़रूर दुनियादारी में
लेकिन एक लम्हा भी तेरे ख्याल से गाफिल नहीं हूँ

"वैभव मैत्रेय"

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