हर बार तेरा कहना, ना कोई गुफ्तगू होगी
थामे है मेरी साँसे, सोचो क्या जुस्तजू होगी
हाल ए दिल आज कौन पूछेगा हमसे
हर बार यही सोच मेरे रूबरू होगी
तुम तो शायद हो भी जाओ मसरूफ गैरों में
कैसे करू बयां, क्या हालत तब मेरी होगी
हर बार तेरा कहना, ना कोई गुफ्तगू होगी
हमने कहा है अक्सर, आप मर्ज़ी के मालिक हैं
गर ना भी करें बातें, फिर भी हमें कबूल होगी
सीखा है चार दिन से, मैंने रिश्तों को सहेजना
गर टूटे भी दिल मेरा, कोई शिकायत नहीं होगी
ज़रूरी नहीं की चाहत के एवज में मिले चाहत
मै क्यों करूँ उम्मीद, जब कभी ये हसरत पूरी नहीं होगी
हर बार तेरा कहना, ना कोई गुफ्तगू होगी
थामे है मेरी साँसे, सोचो क्या जुस्तजू होगी
वैभव मैत्रेय
थामे है मेरी साँसे, सोचो क्या जुस्तजू होगी
हाल ए दिल आज कौन पूछेगा हमसे
हर बार यही सोच मेरे रूबरू होगी
तुम तो शायद हो भी जाओ मसरूफ गैरों में
कैसे करू बयां, क्या हालत तब मेरी होगी
हर बार तेरा कहना, ना कोई गुफ्तगू होगी
हमने कहा है अक्सर, आप मर्ज़ी के मालिक हैं
गर ना भी करें बातें, फिर भी हमें कबूल होगी
सीखा है चार दिन से, मैंने रिश्तों को सहेजना
गर टूटे भी दिल मेरा, कोई शिकायत नहीं होगी
ज़रूरी नहीं की चाहत के एवज में मिले चाहत
मै क्यों करूँ उम्मीद, जब कभी ये हसरत पूरी नहीं होगी
हर बार तेरा कहना, ना कोई गुफ्तगू होगी
थामे है मेरी साँसे, सोचो क्या जुस्तजू होगी
वैभव मैत्रेय