Friday, 3 February 2012

अनदेखा सच

आज कल हर रोज़ मै अपने को अपने से जुदा करता हूँ
इस ठंडी के मौसम में रजाई से ना निकलूं यही दुआ करता हूँ

लेकिन कहाँ हर दुआ किसी की कबूल होती है
उठना तो पड़ता ही है, जब श्रीमती गरमा गर्म चाय देती हैं

ये दिनचर्या सदियों से यूँही चलती थी
जब उठाने पर बिटिया दस बार आँखें मलती थी

और शायद ये कार्यक्रम यूँही आगे भी चलता रहता
गर आज वोह दीन मेरी नज़रों के सामने ना आया होता

ना मालूम इस से पहले भी मैंने देखा हो उसे
ना मालूम इस से पहले भी कितनो ने देखा हो उसे
पर ये करुणा ना उपजी थी आज से पहले कभी
माँगा कितनो ने आकर मेरे पास, लेकिन दिया ना कभी

आज कल हर रोज़ मै अपने को अपने से जुदा करता हूँ

कैसे करूँ बयां, मै उस पीड़ा से भरे दृश्य को
मिल जाये तेरी कृपा उस  असहाए मनुष्य को
ठिठुर रहा एक कम्बल में वो चार छोटे बच्चों के साथ
सिमटे हुए अपने में और  थामे एक दूसरे का हाथ

ना हीटर की कोई गुंजाईश, ना रजाई का कहीं नाम
ना कोफी का गरम प्याला, ना ब्लोअर का कहीं काम 
किससे करे गिला, वो अपनी इस परिस्थिति का
कहाँ से लाये मदद जो करे उद्धार उस मनस्थिति का

मेरे भी पास सिर्फ करुणा ही थी, उस वक़्त ना कुछ और था
मेरी आँखों में कुछ आंसू थे और ना जाने मै क्यों मजबूर था

हर बार मेरे तृप्त मन की इस अत्रिप्ता से मै डरता हूँ
मनुष्य ना हो इतना कठोर, प्रार्थना यही मै करता हूँ

आज कल हर रोज़ मै अपने को अपने से जुदा करता हूँ

फिर सुना एक मित्र से एक और पहलु अनसुना
कर्मों का ये जो भोग है, इश्वर ने ही है बुना
जिन्हें देख कर मै परेशान हूँ, मनुष्य होने पर पशेमान हूँ
वो उनका ही चुना जीवन है, मै जिससे अब तक अनजान हूँ

सुनाई उसी मित्र ने, कहानी एक विचित्र सी
हर दीन सुदामा नहीं, कुछ होते हैं कंस चरित्र भी

देखा अभी हाल ही में, एक पुरुष विकलांग था
जीवन यापन के लिए, भिक्षा ही जिसका काम था
रहता अनाथों के संग, एक आश्रम में घर की तरह
ना कोई उम्मीद किसी से, अधर में शुन्य की तरह

पुछा जो उस मित्र ने, क्या हो सकता कोई इलाज नहीं
मै भरूँगा खर्च सारा, मुझे कोई एतराज़ नहीं

बतलाया उसे जब मित्र ने, उस चिकित्सक का पता
बोला वो दीन ना चाहिए कुछ, ना ये करुणा दिखा

मै नहीं हूँ चाहता, अपनी स्तिथि को बदलना
खुश हूँ इन पहिंयो पे मै, नहीं चाहता मै चलना

यकीन नहीं था कानो पे अपने, पर बतलाया जब उस दीन ने
क्या कमा पाते हो तुम, जो समझे हो की हम हीन हैं

हर रोज़ एक गाँधी मै कम से कम कमाता हूँ
और कोई कभी दिलदार मिले जब, हज़ार भी ले जाता हूँ
गर न होता में अपाहिज, कौन मुझे फिर पूछता
मै भी खो जाता इस भीड़ में, और रहता इश्वर को कोसता

मै तो करता हूँ धन्यवाद, हर रोज़ उस भगवान् का
बनाया मुझे तुम सब से अलग और दिया हर साधन मुझे
तुम न वक़्त मेरा यु बर्बाद करो, हो गया रोज़ी का टाइम
कुछ काम करो, अपना काम करो

वैभव मैत्रेय

No comments:

Post a Comment