Thursday, 10 October 2013

खामोशी

खामोशी मेरी तुम सुन ना पाओगे
जब तक हमे ना अपने पास बुलाओगे
लबों पे मेरे मुस्कराहट तो होगी
मगर दिल के दर्द को कहाँ देखपाओगे
तरसति रहेंगी ये रातें भी तब तक
हमें अनजुमन में ना जब तक बुलाओगे
चिरागों की रोशनी तो परवाने के लिये थी
भला किस रोशनी से ये चिराग जलाओगे
"वैभव मैत्रेय"

Monday, 7 October 2013

तेरे ख्याल

एक पल भी तेरे ख्याल से गाफिल नहीं था मैं
बेशक तेरा चर्चा सरेआम ना हुआ
मजमां मेरी मसरूफियत का कारण बन गया
सलामत रहे तू फिर यही थी बस दुआ
"वैभव मैत्रेय"

तेरी रहमत

कृपा ईश्वर की मुझपर दिन रात रहती है
बड़ा खुशनसीब हूँ मैं ऐसा दुनियाँ कहती है
तेरी रहमत को मैं हरबार मेहसूस करता हूँ
करके हरबार तेरे दर्शन, मेरी अश्रुधारा बहती है
होते ही परेशान, बुलाना तेरा करीब
नज़रें इनायत ऐसी तेरी हरबार होती है
कृपा ईश्वर की मुझपर दिन रात रहती है
बड़ा खुशनसीब हूँ मैं ऐसा दुनियाँ कहती है
"वैभव मैत्रेय"

Wednesday, 18 September 2013

तेरी यादें

क्यूँ आता है मुझे याद वो गुज़रा ज़माना
करके बंद आखें वो तेरा मुस्कराना
बना के बहाना तेरा वो मिलने भी आना
मेरी शामों को भी वो रंगीं बनाना
हवाला मोहोब्बत का देकर के हमको
अक्सर तेरा हमें आजमाना

क्यूँ आता है मुझे याद वो गुज़रा ज़माना

मैं उस वक़्त को वापस बता लाऊ कैसे
सपनों को फिर से सजाऊ मैं कैसे
तेरी गर्म साँसे भुलाऊ मैं कैसे
चाहत है दिल में, दिखाऊ वो कैसे
आसां नहीं यू हमें भूल पाना

क्यूँ आता है मुझे याद वो गुज़रा ज़माना

"वैभव मैत्रेय"

हंसी

तेरी एक हंसी पे मैं हस दिया
तेरी कातिल निगाहों में यूँ फस गया

तेरे रूप के सदके मैं क्या करूँ
तेरा मासूम चेहरा दिल में बस गया

तेरी बातों में एक शरारत सी है
तेरे लबों पे एक मुस्कराहट से है
तेरे दीदार को ए जानेमन
मेरा बेचैन दिल भी मचल गया

तेरी एक हंसी पे मैं हस दिया
तेरी कातिल निगाहों में यूँ फस गया

तेरी ख़ामोशी भी नहीं बेज़ुबां
तेरी बातों पे लुटा दूँ मैं दोनों जहाँ
चल आज तुझे लेकर चलूँ वहां
मेरा इश्क मुकम्मल हो जाये जहाँ

"वैभव मैत्रेय"

Friday, 13 September 2013

एक रिश्ता मुकम्मल रहता है

कभी नज़रें इनायत से
कभी शिकवे शिकायत से 
एक रिश्ता मुकम्मल रहता है
तेरी दिलकश बातों से

कभी मजबूर कर देना
कभी मजबूर हो जाना
मांगना एक दूसरे से फिर माफ़ी
हर एक हिमाकत पे

कभी तकरार की बातें
कभी वो प्यार की रातें
खुदको फनाह करके
देना प्यार की सौगातें

एक रिश्ता मुकम्मल रहता है
तेरी दिलकश बातों से

कभी आना करीब तेरा
कभी खुद से जुदा करना
कभी ना मिलने की बातें
कभी पास आने के तेरे वादे
एक रिश्ता मुकम्मल रहता है
तेरी दिलकश बातों से

"वैभव मैत्रेय"

Tuesday, 3 September 2013

वो मेरा शहर कुछ और था

वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है

वो अंदाज़े बयां कुछ और था
ये अंदाज़े बयां कुछ और है

हर सांस पे तेरी मेरा रुक जाना
ना मेरा कोई तब जोर था
ना तेरा कोई आज जोर है
वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है


खोजाना तेरा मेरी बातों में
चारो तरफ मशहूर था

हमें सिर्फ तुमसे मोहोब्बत थी
जिसका छाया नशा हर ओर है

हर बात पे आंसू बहाना तेरा
ना तब मुझे मंज़ूर था
ना आज मुझे मंज़ूर है
वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है
वो अंदाज़े बयां कुछ और था
ये अंदाज़े बयां कुछ और है

सब शिकवे शिकायत फनाह हुए
एक तेरे आने के बाद
वो बीत गयी जो रात थी
हुई रिश्तों के नई भोर है

वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है
वो अंदाज़े बयां कुछ और था
ये अंदाज़े बयां कुछ और है

है फासला सिर्फ जिस्मों के बीच
ये जो डोर रही है तुमको खींच
मेरे दिल की आवाज़ थी
ना जिसने किया कभी शोर है

वो मेरा शहर कुछ और था
ये तेरा शहर कुछ और है
वो अंदाज़े बयां कुछ और था
ये अंदाज़े बयां कुछ और है

"वैभव मैत्रेय"



Wednesday, 21 August 2013

कोई रिश्ता ज़रूर है

तेरे मेरे दरमियाँ कोई रिश्ता ज़रूर है
यूँ ही नहीं देखा जो तेरी आँखों  में नूर है

मसरूफ सिर्फ तुम नहीं जानिब हम भी हैं
दुनियादारी से थोडा मुखातिब यक़ीनन हम भी हैं 

दिन रात मेरी ज़िन्दगी में जो आया सुरूर हैं
यकीं है मुझे, तेरी आँखों का कसूर हैं

नजाने किस बात का गुमां है तुम्हे
तुमने भी प्याला इश्क ये पिया तो ज़रूर है

क्यूँ हाथ थाम के मुझे करीब बुला लिया
दिल देकर क्यों अपना मेरा दिल चुरा लिया
तराना भी जो दिल है गा रहा
आप ही का हुज़ूर है


तेरे मेरे दरमियाँ कोई रिश्ता ज़रूर है
यूँ ही नहीं देखा जो तेरी आँखों  में नूर है

करना सनम की बातें हो कर सनम से दूर
आना करीब आपका, होकर नशें में चूर
मोहब्बत पे हमें आपकी बेपनाह गुरूर है

तेरे मेरे दरमियाँ कोई रिश्ता ज़रूर है
यूँ ही नहीं देखा जो तेरी आँखों  में नूर है

"वैभव मैत्रेय"


 

Tuesday, 6 August 2013

एक कतरा अश्क का

एक कतरा अश्क का
मेरी आँख में यूँ चुभ गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

हाथों में फिसलती रेत सा
तेरा दामन भी फिसल गया
जिन लबों को तूने गीत दिए
क्यों तन्हा उन्हें यूँ कर दिया 

एक कतरा अश्क का

कभी रौशनी की बात से
कभी अंधेरों में मुलाकात से
तेरा पता क्यों मैं पूछता
किस राह पर निकल गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

हर बार अधूरी बात कर 
तेरा बात ही बदल देना
हर बार गीत गुनगुनाना तेरा 
और संगीत ही बदल देना
मुझे फिर निशब्द कर गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

एक कतरा अश्क का
मेरी आँख में यूँ चुभ गया

"वैभव मैत्रेय"

इत्तेफाक

बूंदों में बरसती  रही
कुछ ज़िन्दगी इस तरह

किस्तों में पी रहा हो
कोई शराब जिस तरह

"वैभव मैत्रेय"