Friday, 2 March 2012

आखें

यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए

तू आये पास चाहे ना ही सही
बंद आँखों से ही शायद तेरा दीदार हो जाये

एक पैमाना जैसे भर के छलकता हो कहीं
दो बूंद जाम हमें भी शायद आज मिल जाए

मै अपनी प्यास बयां  कैसे करूँ तुझसे बता
काश तेरी आखों से ही शायद आज पी पायें

एक खुमारी सी मेरी आँखों में नज़र आती है मुझे
नशे में इसके शायद तू  भी आज बहक जाए

कोई चेहरा नहीं आता नज़र तेरे आगे
आज क्यूँ ना ये वक़्त यहीं ठहर जाए

मेरे हाथों की लकीरों में तेरा नाम है यू लिखा
कोई पंडित ना जिसे कभी  भी पढ़ पाए

यही सोच कर के देखते हैं आपको हमेशा
कहीं कोई दास्तान ही शायद बन जाए

वैभव मैत्रेय

Wednesday, 29 February 2012

कल तो बम्ब गिरेगा

कल तो बम्ब गिरेगा, बम्ब का काम है गिरना
छोड़ो बेकार की बातों में, कहीं मर न जाए पड़ना

कल तो बम्ब गिरेगा, बम्ब का काम है गिरना

कुछ कहानी कुर्सी की एसी है, हर एक सल्तनत आम हुई
तू कौन है, तेरा नाम है क्या, कई शेर भी यहाँ गुमनाम हुए
फिर क्यों बढ़ने की चाहत में, तुने बेच दिया अपना चैना
कल तो बम्ब गिरेगा, बम्ब का काम है गिरना

हमको वो सराहा करते थे, हम खोये है अपने कामों में
हमने भी चाह दिल से जिन्हें, उन्हें थाम न पाए बाँहों में
ये सच है झूठी बात नहीं, तुम मानलो मेरा कहना
कल तो बम्ब गिरेगा, बम्ब का काम है गिरना

उठा पटक

उठा पटक - उठा पटक
कभी इसको पटक, कभी उसको पटक

गर दिल जो तेरा कभी जाये जो भटक
एक भांग की गोली...... ले तू भी सटक

अटपट, खटपट, होती हरवक्त
सोयें देर से हमेशा.............जागें झटपट

उठा पटक - उठा पटक
कभी इसको पटक, कभी उसको पटक

क्यों हो रहा हर ओर ये जो इतना शोर
हुए कागज़ के रिश्ते, थामें रेशमी डोर

हुई लम्बी कहानी ओर छोटे नाटक
घर ग़ुम हो गए, दिखें सिर्फ फाटक

उठा पटक - उठा पटक
कभी इसको पटक, कभी उसको पटक

वैभव मैत्रेय