Monday, 5 November 2012

कर के क़त्ल मेरा

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका कुछ भी तुझसे

तेरा रोना भी था देखा मैंने
गुमनामी के अंधेरों में
दर्द महसूस था किया
चोट लगी थी दिल पे

लोग भी आये जो देने कांधा मुझे
टूटा बाँध था आँखों से तेरी
न संभाल पाया मै तुझे

ले गए वो आखिर
मुझको दूर तुझसे

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी 
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका 
कुछ भी तुझसे

पहुंचा जनाज़ा जब मेरा
सूना था शमशान पड़ा
नहीं औकात किसी की
है खुदा ही सबसे बड़ा

जला दिया जिस्म फिर मेरा
पैदा करने वाले ने खुदसे

कर के क़त्ल मेरा
तुमने माँग ली थी
जो माफ़ी मुझसे
सिल दिए थे लब मेरे
ना कह सका
कुछ भी तुझसे

"वैभव मैत्रेय"




 

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