Friday, 4 May 2012

आवाज

तेरी आवाज मुझे बनाती है क्यों दीवाना 
मान कहना, न मचलना, थम जा 
बन जाये न कहीं कोई अफसाना 

ये  जस्बा ए मोहोब्बत नजाने  क्यों  पैदा  हुआ
मै हूँ गुम तुझमे, तुझसे न कभी अल्हैदा हुआ 
माना मसरूफ न थे हम बंदगी में तेरी 
चाहा बेपनाह, चाहा हर बार तुम हो जाओ मेरी 
जलना चाहे है इस शमा पे ये परवाना 
 
 
माना हर बार ये दूरी है तेरी मायूसी का सबब 
मैंने भी सिर्फ दिया प्यार, तुमसे बदले में माँगा है कब 
न छिपा चेहरे को अपने, नकाब हटा दे अब 
कहीं ऐसा न हो, मै हो जाऊ रुक्सत दुनिया से तेरी 
कहीं ऐसा न हो की तुम को पड़े कल पछताना

तेरी आवाज मुझे बनाती है क्यों दीवाना

आज फिर तेरा ज़िक्र चला

आज फिर तेरा ज़िक्र चला, आज फिर तेरी याद उभर आई 
बैठा था भीड़ में फिर भी, हर ओर थी सिर्फ तन्हाई 

तेरा हँसता हुआ चेहरा न जाने कब आँखों के आगे आ गया 
याद आया वो ज़माना, जब तेरी अदाओं का जादू मुझपे छा गया 

चला फिर सिलसिला उन खतों का जो शुरू तुमने किया 
कहाँ जानता था कुछ कहना, मगर बयां जो मैंने किया 
देखते - देखते वक़्त भी करवट लेता गया 
चलते - चलते फासला भी कम होता गया 

आये तुम करीब इतना की मै फिर पूर्ण हुआ 
सिर्फ चाहा तेरा साथ, न मांगी कोई ओर मैंने दुआ 

कई किस्से, कई बाते ज़हन में बसी हैं इस तरह 
नशा शराब में मिला हो, बंद बोतल में जिस तरह 
तेरी खुश्बू मै अक्सर महसूस करता हूँ अपने में 
न हो रूबरू तो क्या, मिल लेता हूँ मै सपने में 

हर बार तेरा आना ओर फनाह हो जाना 
करता है बेचैन तेरा मिलाना ओर मिल के खो जाना 

क्या ये दौर हमेशा गुज़रेगा इसी तरह 
क्या इस दिल को कभी मिलेगा सुकून किसी तरह 
या हर बार फिर मिलेगी यही रुसवाई 
आज फिर तेरा ज़िक्र चला, आज फिर तेरी याद उभर आई
बैठा था भीड़ में फिर भी, हर ओर थी सिर्फ तन्हाई




Wednesday, 2 May 2012

ये प्रकृति सुन्दर, अनमोल है

ये प्रकृति सुन्दर, अनमोल है 
रहते है सब जीव जहाँ 
वो धरती एकदम गोल है

हर और मनोहर दृश्य है 
जहाँ रह रहा मनुष्य है 
यहाँ बाग़ में कोयल गाती है 
और नदिया संगीत सुनाती हैं 
फसलें नाच दिखाती हैं 
और रेत टीले बनाती हैं 
इस मनोहर दृश्य का 
बोलो क्या कोई मोल है 

ये प्रकृति सुन्दर, अनमोल है
रहते है सब जीव जहाँ
वो धरती एकदम गोल है

तीन ऋतुओ का देखो खेल 
ग्रीषम,  शीत और बसंत का मेल 
साल शुरू है ग्रीष्म से होता
बसंत है फिर प्रकृति को धोता
 शीत में हर कोई चैन से सोता 
यहाँ पक्षियों का जो शोर है 
हर रात के बाद भोर है 
इन सब का न कोई मोल है 
ये प्रकृति बहुत अनमोल है 
रहते है सब जीव जहाँ वो धरती एकदम गोल है