Friday, 13 July 2012

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

हर बार तेरा आना तेरी यादों के साथ
हर बार धड़कना दिल का कुछ जज्बातों के साथ
करना फिर इंतज़ार मेरा एक मुलाकात के बाद
आना बंद आँखों में तेरा एक खुमारी के साथ

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

झांकना मेरा तेरी आँखों में इस तरह
पढ़ रहा हो किताब कोई इबादत की तरह
और फिर तेरा मुस्कराना कुछ शरारत के साथ
गुज़रते वक़्त का थमना कुछ संकोच के साथ

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

एक रात भी बिस्तर पर न कटेगी तेरे साथ
एक दीदार चाँद का भी होगा कभी न तेरे साथ
है तलाश जिस बूँद की न मिलेगी मेरे पास
होगी सदी वो कौनसी जहाँ कृष्ण करेंगे रास

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

कभी चेहरों में ढूंडना चेहरा तेरा ओर मुस्करादेना
कभी सुनना तेरे गीतों को ओर गुन्गुनालेना
कभी छूना तेरे अंगारों को ओर साँसों में बसालेना

ये मौसम ए हाल हमें अच्छा लगता है

अक्सर मै ये सोचता हूँ
बालों को अपने नोचता हूँ
क्या ख़त्म होगा ये इंतज़ार भी मेरी ज़िन्दगी के साथ
या रहेंगे यूँही इन्हें हम पालते दीवानगी के साथ

"वैभव मैत्रेय"

No comments:

Post a Comment