Monday, 16 April 2012

जिंदगी एक सफ़र

आज डी टी सी की ऐ.सी बस में बैठ मै सोचने लगा की  ज़िन्दगी क्या है ! आज सोचा तो महसूस किया कि ये जिंदगी एक न ख़त्म होने वाला एक सफ़र है जो मेरे पैदा होते ही शुरू हो गया था !

पैदा होने के चंद मिनटों के बाद मुझे भी लिटा दिया गया बाकी एक दर्जन बच्चों के साथ,
मै चिल्लाया बुलाने अपनों को, बतलाने दुनिया को कि मै नहीं अनाथ !
फिर घर मुझे भी लाया गया और प्यार से ये समझाया गया
कौन हैं माँ बाप मेरे, ये बोलना सिखलाया गया
चंद साल भी गुज़रे न थे, मुझे माँ कि गोद में खेलते
बोलना ही सिखा था मै और लगे लोग मुझे ठेलते
पहुंचा मै भी स्कूल सिखने कुछ इंसानी असूल
छोड़ना था मासूमियत को अपनी और कहलवाना था कूल

साल पे साल यूँही बीत गए
ख़त्म हुई पढाई तो लगा जैसे कोई जंग जीत गए
लकिन ये क्या, ये तो सिर्फ अभ्यास था
ज़िन्दगी जीना सीखने का, मात्र एक प्रयास था
अब शुरू हुई एक नयी नौकरी पाने की तलाश
साबित करने की खुद को कि नहीं मै कोई जिंदा लाश
ताकत लड़ने कि मुझमे भी है
कुछ हासिल करना मुझको भी है
और इसी कोशिश में नजाने क्या क्या ले आया मै अपने साथ
एक बीवी और दो बच्चे, जुड़ गए कब मेरे साथ

चल रही है नौकरी, भर रही हम सब का पेट
जाने मै किस रहा चल रहा जो ना मिला आज तक एक्सिट गेट
लेकिन इन लोगों कि भीड़ में जब भी होती इश्वर से भेंट
सारे दुःख दर्द मिट जाते और दिल कहता god हो तुसी ग्रेट

आज सोचा तो महसूस किया कि ये जिंदगी एक न ख़त्म होने वाला एक सफ़र ही तो है



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