हर बार बात करने का
वो बहाना ढूँढ़ते हैं
सुनाने को हमें अक्सर
वो तराना ढूँढ़ते हैं
करते हैं बयां वो
निगाहों ही से हमेशा
जलाकर हमें शमा पर
वो परवाना ढूँढ़ते हैं
"वैभव मैत्रेय"
वो बहाना ढूँढ़ते हैं
सुनाने को हमें अक्सर
वो तराना ढूँढ़ते हैं
करते हैं बयां वो
निगाहों ही से हमेशा
जलाकर हमें शमा पर
वो परवाना ढूँढ़ते हैं
"वैभव मैत्रेय"
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