खामोशी मेरी तुम सुन ना पाओगे
जब तक हमे ना अपने पास बुलाओगे
लबों पे मेरे मुस्कराहट तो होगी
मगर दिल के दर्द को कहाँ देखपाओगे
तरसति रहेंगी ये रातें भी तब तक
हमें अनजुमन में ना जब तक बुलाओगे
चिरागों की रोशनी तो परवाने के लिये थी
भला किस रोशनी से ये चिराग जलाओगे
"वैभव मैत्रेय"
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