गुज़रती है ज़िन्दगी
कुछ इस अंदाज़ से
बचानी हो जैसे जान
चूहे को बाज़ से
ज़िन्दगी के चमन में
कांटे भी हैं जनाब
कब तक मुह छिपाईएगा
यूँ नकाब से
नशा आँखों से पीकर आपकी
उतना ही होता
क्यों प्यास फिर बुझाई
आपने शराब से
संभालना वो की
न फिर खानी पड़े ठोकर
फिर क्यूँ गिराया
गैरों की नज़रों में आपने
लगा कर दाग दामन पर
ढूंडना आब(पानी) को दर दर
यह वो कागज़ का दामन है
जो मिटजायेगा मिटाने से
"वैभव मैत्रेय"
कुछ इस अंदाज़ से
बचानी हो जैसे जान
चूहे को बाज़ से
ज़िन्दगी के चमन में
कांटे भी हैं जनाब
कब तक मुह छिपाईएगा
यूँ नकाब से
नशा आँखों से पीकर आपकी
उतना ही होता
क्यों प्यास फिर बुझाई
आपने शराब से
संभालना वो की
न फिर खानी पड़े ठोकर
फिर क्यूँ गिराया
गैरों की नज़रों में आपने
लगा कर दाग दामन पर
ढूंडना आब(पानी) को दर दर
यह वो कागज़ का दामन है
जो मिटजायेगा मिटाने से
"वैभव मैत्रेय"
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