Tuesday, 6 August 2013

एक कतरा अश्क का

एक कतरा अश्क का
मेरी आँख में यूँ चुभ गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

हाथों में फिसलती रेत सा
तेरा दामन भी फिसल गया
जिन लबों को तूने गीत दिए
क्यों तन्हा उन्हें यूँ कर दिया 

एक कतरा अश्क का

कभी रौशनी की बात से
कभी अंधेरों में मुलाकात से
तेरा पता क्यों मैं पूछता
किस राह पर निकल गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

हर बार अधूरी बात कर 
तेरा बात ही बदल देना
हर बार गीत गुनगुनाना तेरा 
और संगीत ही बदल देना
मुझे फिर निशब्द कर गया
ऐ हमदम मेरे मुझे छोड़ कर
तू न जाने किधर गया

एक कतरा अश्क का
मेरी आँख में यूँ चुभ गया

"वैभव मैत्रेय"

No comments:

Post a Comment