Wednesday, 23 January 2013

ज़िन्दगी और मौत

ज़िन्दगी और मौत कितनी हैं जुदा
एक पल को लगे है अपनी और एक पल में जुदा

कितनी ही बार करीब से देखा है दोनों को मैंने
रहती हैं साथ साथ, जैसे हो कोई सगी बहने

अब कल ही की जैसे रात थी
कितनी अजीब बात थी
जूंझ रही थी मौत से जो
उसे ज़िन्दगी ने सौगात दी

और वहीँ दूसरी तरफ

जीवन को वो पैदा करके
चली गयी थी आज वो
अपनों को तन्हा करके

ये क्या विडम्बना है,
मुझको बता तू ऐ खुदा
ज़िन्दगी और मौत आखिर
क्यों हैं इतनी जुदा
एक पल जो लगे थी अपनी
कैसे वो हो गयी जुदा

रोज़ हजारों हैं झेलते
इन बहनों की तकरार को
खुशनसीब हैं जिन्होंने
पाया जीवन के उपहार को

और वहीँ दूसरी तरफ

मौत आई हिस्से में जिनके
सब कुछ ही जैसे थम गया
एक हँसता, मुस्कराता चेहरा
ना जाने अब किधर गया

एक तरफ तो जशन है
वहीँ सन्नाटा है दूसरी ओर
एक ने थामी है ज़िन्दगी
और एक ने छोड़ दी है डोर

अब हर तरफ ख़ामोशी है छाई
न सुनाई देता कोई शोर
आज अँधेरा है ज़रूर हर तरफ
लेकिन कल होगी विभोर

ये नियति है इंसान की
कहाँ चलता है किसी का ज़ोर

"वैभव मैत्रेय"
 

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