Tuesday, 14 May 2013

एक आंसू

एक आंसू गिर पड़ा 
चुप चाप कल आँख से
कैसे छिपाऊ बताओ इसे
हुज़ूर मैं आप से

क्या बताऊ की ये आया
कहाँ से मेरे खुदा
क्या जानु क्यों बहा
क्यों परेशां है दिल होकर जुदा 

कर रहा था क्या ये भी
इंतज़ार मेरे तनहा होने का
शायद अफ़सोस था इसे भी
मेरे खामोश होने का

बह निकला अचानक
फट पड़े जज़्बात थे
एक आंसू गिर पड़ा
चुप चाप कल आँख से
कैसे छिपाऊ बताओ इसे
हुज़ूर मैं आप से

"वैभव मैत्रेय"
 

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