अपने क़र्ज़ और फ़र्ज़ को पूरा करने के लिए इंसान जन्म लेता है
जन्म के बाद वोह अपने क़र्ज़ और फ़र्ज़ से ही मुह मोड़ लेता है
मोह माया के बंधन में वोह कुछ नहीं सोचता
सिर्फ भोग विलास के साधन है खोजता
जब हो नहीं पाती उसकी मनोकामनाएं पूर्ण
वोह तैयार हो जाता है अपनाने को दुर्गुण
मंजिल दूर चली जाती है
और क़र्ज़ और फ़र्ज़ की बातें अगले जन्म के लिए रह जाती हैं
वैभव मैत्रेय
जन्म के बाद वोह अपने क़र्ज़ और फ़र्ज़ से ही मुह मोड़ लेता है
मोह माया के बंधन में वोह कुछ नहीं सोचता
सिर्फ भोग विलास के साधन है खोजता
जब हो नहीं पाती उसकी मनोकामनाएं पूर्ण
वोह तैयार हो जाता है अपनाने को दुर्गुण
मंजिल दूर चली जाती है
और क़र्ज़ और फ़र्ज़ की बातें अगले जन्म के लिए रह जाती हैं
वैभव मैत्रेय
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