Monday, 21 November 2011

Aagosh

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै

एक तेरी सुरमई आवाज़ का दीवाना हूँ मै
फिर वही ग़ज़ल गाना चाहता हूँ आज खामोश मै

तुम हो उलझी जिस कशमकश में बात वो संजीदा नहीं
सिर्फ यही यकीन दिलाना चाहता हूँ आज अफ़सोस मै
 

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै

हम तुम हुए थे जब जुदा वो लम्हा मुझे भुला नहीं
तुम फिर मिलोगी इस तरह था मैंने सोचा कभी नहीं


ये वक़्त का ही कोई खेल है, मेरा तेरा जो ये मेल है
तेरे ही खवाब चाहता हूँ आज देखना बेहोश मै


हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै


हर बार देखा मैंने तुझे अपने में ही डूबता
कहाँ खोजने जाता तुझे मै आज इस शोर में

जिस्म बेशक जुदा थे उस सफ़ेद चादर में सनम
आत्मा पर एक थी और भूले थे हम दुनिया के गम
होले से फिर तुमने कहा आज उसी जोश में

हर बार खो जाना चाहता हूँ मै तेरी आगोश में
बिन पिए हो जाना चाहता हूँ आज मदहोश मै


वैभव मैत्रेय

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