Friday, 11 November 2011

Ek Raat

सर्द रातों में गर्मी को खोजता रहा
दर्द नहीं था फिर भी चीखता रहा

चीख एक शुन्य में जाती रही
अनगिनत आवाज़े मुझे पास बुलाती रही

आवाजे कुछ जानी पहचानी सी लगी
एहसास का दर्द लिए गाती सी लगी

कुछ भी हो, गाना जो भी गा रहा था
शायद मुझे भी अपने पास बुला रहा था

जज्बातों की दुनिया में है एहसासों की कीमत
मगर खरीदना मेरे लिए नहीं है जायज़

वैभव मैत्रेय

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