Wednesday, 9 November 2011

Bebasi

कुछ देखा बेबस लोगो को आज
कुछ समझे इस दुनिया के काज

क्यों दुखी ये संसार है
क्यों करता आदमी - आदमी पर वार है

क्यों पानी का रंग हो गया लाल
क्यों उड़ रहे सब ओर बवाल

क्यों बच्चे हैं सहमे गुमसुम
क्यों हर वक़्त किताबो में हैं गुम

क्यों रिश्तों का आभास नहीं
क्यों इंसान को इंसानों पर विश्वास नहीं

क्यों पैसा बन गया खुदा
क्यों हर कोई आपस में है जुदा

मै अक्सर यही सोचता हूँ
किस शख्स को यु खोजता हूँ

क्या ना होगा वोह भी इन जैसा
क्या नहीं चाहेगा वोह ये पैसा

कैसे उसे मै अपनाऊंगा
कैसे उसे मै समझाऊंगा

ना जाने होगा वोह बेबस कितना
चाहेगा जो वतन पे मिटना
फिर नहीं कहीं दुःख होगा
प्यार जब मज़हब होगा
लाल सिर्फ मेहँदी होगी
खुशाल हर जिंदगी होगी


बच्चे निरद्वंद होजाएगे
विद्द्यालय फिर मंदिर कहलायेंगे


हर रिश्ता अहम् बनजायेगा
जब प्रेम ध्वज लहराएगा


पैसे का कोई मूल्य न होगा
सीमाओं का जब अंतर न होगा
हर गृहसत भी फिर संत होगा
जब वात्सल्य का ना कोई अंत होगा


कुछ देखा बेबस लोगो को आज
कुछ समझे इस दुनिया के काज  

वैभव मैत्रेय

1 comment:

  1. Ichhaaon ki is nadi mein tairna nahi hai aasaan...kehne ko to ek soch he paryaaapt hai kshamtaaaon mein paro ko ugaane ke liye...parantu jo seemaao ke bandhano mein apne sapno ko saakaar kar sake ... wohi jeevan saarthak kehlaata hai... aapki chaah jayaz hai... badhte chalo... ek jeevan mein bhee kuch badlaav la sako to maano sab kuch mil jayega.

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